शिमला के गांव में मिले काले भालू के दो अनाथ शावक, खौफ के बीच वन विभाग ने ऐसे बचाई जान

Himachal Pradesh News: हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले में एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। ठियोग क्षेत्र के संधू गांव में हिमालयी काले भालू के दो छोटे शावक लावारिस हालत में मिले हैं। ग्रामीणों ने बगीचे में इन शावकों को देखा तो इलाके में भारी दहशत फैल गई। सूचना मिलते ही वन विभाग की टीम तुरंत मौके पर पहुंची। वन कर्मियों ने दोनों शावकों का सुरक्षित रेस्क्यू कर लिया है।

मां का दो दिनों तक किया गया इंतजार

वन विभाग ने रेस्क्यू के बाद तुरंत शावकों को वहां से नहीं हटाया। कर्मचारियों ने दो दिन तक शावकों की मां का इंतजार किया। आसपास के जंगलों में मादा भालू की काफी तलाश भी की गई। तमाम कोशिशों के बावजूद मादा भालू वापस नहीं लौटी। इससे शावकों की जान को खतरा पैदा हो गया। बिना मां के दोनों की हालत लगातार नाजुक होती जा रही थी। ऐसे में टीम ने उन्हें सुरक्षित जगह पर शिफ्ट करने का अहम फैसला लिया।

बोतल से दूध पिलाकर मिटाई गई भूख

दोनों शावकों को सीधे शिमला के टूटीकंडी वन्यजीव बचाव केंद्र लाया गया है। इन नर शावकों की उम्र अभी महज एक महीना है। फिलहाल इनकी स्थिति काफी नाजुक बनी हुई है। पशु चिकित्सकों की टीम इनकी लगातार निगरानी कर रही है। भूख से तड़प रहे इन शावकों को वन कर्मियों ने बोतल से दूध पिलाया। दूध पीने के बाद इनकी भूख शांत हुई और ये सहज महसूस करने लगे। अब बचाव केंद्र में इनकी विशेष देखभाल की जा रही है।

हिमालयी काले भालू का प्राकृतिक बसेरा

हिमालयी काले भालू मुख्य रूप से हिमाचल प्रदेश के ऊंचे पहाड़ी और घने वन क्षेत्रों में पाए जाते हैं। कुल्लू, चंबा और कांगड़ा जिले के जंगलों में इनकी अच्छी खासी आबादी है। इसके अलावा किन्नौर और शिमला के रामपुर व ठियोग में भी इनका बसेरा है। सर्दियों में बर्फबारी के दौरान ये अक्सर भोजन की तलाश में निचले इलाकों की ओर आ जाते हैं। यही कारण है कि कई बार इनका सामना ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय लोगों से होता है।

वन्यजीवों का मसीहा बना बचाव केंद्र

शिमला का टूटीकंडी वन्यजीव बचाव एवं पुनर्वास केंद्र बेसहारा जंगली जानवरों के लिए एक वरदान साबित हो रहा है। पिछले मात्र तीन वर्षों के भीतर इस केंद्र की बचाव टीम ने लगभग 350 जंगली जानवरों की जान बचाई है। यहां घायल और अनाथ वन्यजीवों का विशेषज्ञ डॉक्टरों द्वारा इलाज किया जाता है। जानवरों के पूरी तरह स्वस्थ होने के बाद उन्हें वापस उनके प्राकृतिक आवास में सुरक्षित छोड़ दिया जाता है। यह पहल पर्यावरण संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है।

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