Delhi News: टाइप 2 डायबिटीज एक बेहद गंभीर और साइलेंट किलर बीमारी है। इसमें हमारा शरीर खून के भीतर मौजूद ग्लूकोज का सही और सुचारू तरीके से इस्तेमाल करने में पूरी तरह असमर्थ हो जाता है।
इस खतरनाक बीमारी का मुख्य और सबसे बड़ा कारण शरीर में इंसुलिन रेजिस्टेंस का पैदा होना होता है। आमतौर पर टाइप 2 डायबिटीज को हमेशा अत्यधिक मोटापे से ही सीधा जोड़कर देखा जाता है, जो पूरी तरह सही नहीं है।
मेडिकल साइंस के अनुसार हर डायबिटीज मरीज मोटापे का शिकार नहीं होता है। ब्राजील के प्रसिद्ध शोधकर्ताओं द्वारा की गई एक नई वैज्ञानिक स्टडी में यह बड़ा खुलासा हुआ है कि ओमेगा-3 फिश ऑयल इंसुलिन रेजिस्टेंस में सुधार कर सकता है।
क्या कहती है वैज्ञानिकों की यह नई स्टडी?
साल 2026 में प्रकाशित एक बेहद प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल की लेटेस्ट स्टडी के मुताबिक, ओमेगा-3 फिश ऑयल के नियमित सेवन से टाइप 2 डायबिटीज का बड़ा खतरा काफी हद तक कम हो जाता है। यह शोध बेहद महत्वपूर्ण है।
हालांकि यह वैज्ञानिक स्टडी मुख्य रूप से चूहों पर की गई थी। लेकिन इसके चौंकाने वाले परिणामों में पाया गया कि फिश ऑयल के इस्तेमाल से शरीर के भीतर इंसुलिन रेजिस्टेंस बहुत कम हुआ और ग्लूकोज टॉलरेंस में बड़ा सुधार देखा गया।
इसके साथ ही मरीजों के ब्लड शुगर लेवल में भी बहुत तेजी से सकारात्मक सुधार दर्ज किया गया। स्टडी में यह भी विशेष रूप से बताया गया कि फिश ऑयल की मदद से शरीर के बैड कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स के लेवल में भारी कमी आई।
ओमेगा 3 फिश ऑयल से शरीर की सूजन होगी कम
इस नई रिसर्च में यह भी प्रमाणित किया गया है कि ओमेगा-3 फिश ऑयल ने शरीर के आंतरिक अंगों की खतरनाक सूजन (इन्फ्लेमेशन) को कम करने में बहुत ज्यादा सक्रिय और प्रभावी भूमिका निभाई है। यह सेहत के लिए बहुत जरूरी है।
वरिष्ठ वैज्ञानिकों के अनुसार इंसुलिन रेजिस्टेंस केवल शुगर मेटाबॉलिज्म बिगड़ने की एक सामान्य समस्या नहीं है। बल्कि यह आंतरिक शरीर की सूजन से भी बहुत गहराई से जुड़ी हुई है। फिश ऑयल इस सूजन को जड़ से खत्म करता है।
स्टडी में विस्तार से पाया गया कि फिश ऑयल ने शरीर की कुछ खास प्रतिरक्षा कोशिकाओं यानी लिम्फोसाइट्स (Lymphocytes) की गतिविधि को पूरी तरह बदल दिया। इस सकारात्मक बदलाव के कारण इंसुलिन के प्रति शरीर की प्रतिक्रिया पहले से बहुत बेहतर हो गई।
इंसानों पर बड़े क्लिनिकल ट्रायल्स की है जरूरत
चूंकि यह शुरुआती रिसर्च पूरी तरह से जानवरों पर की गई थी, इसलिए शत-प्रतिशत इससे यह साबित नहीं होता कि फिश ऑयल इंसानों के शरीर में भी बिल्कुल इसी सटीक तरह से और इतने ही प्रभावी ढंग से काम करेगा।
यही कारण है कि मुख्य शोधकर्ताओं का स्पष्ट कहना है कि अब इंसानों पर बहुत बड़े क्लिनिकल ट्रायल्स करने की तत्काल जरूरत है। इससे यह सटीक पता लगाया जा सके कि इंसानों के लिए ओमेगा 3 की सही और सुरक्षित मात्रा क्या होनी चाहिए।
Author: Asha Thakur


