National News: पृथ्वी से करोड़ों किलोमीटर दूर मंगल और बृहस्पति जैसे ग्रहों पर मौजूद अंतरिक्ष यानों से संपर्क साधना किसी चमत्कार से कम नहीं है। अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने इस बड़ी चुनौती का हल ‘डीप स्पेस नेटवर्क’ (DSN) के रूप में खोजा है। यह दुनिया का सबसे विशाल और वैज्ञानिक टेलीकम्युनिकेशन सिस्टम है। इसके बिना वॉयेजर और मंगल रोवर जैसे मिशनों से तस्वीरें या डेटा मिलना नामुमकिन होता।
तीन देशों में फैला नासा का एंटीना नेटवर्क
नासा की जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी (JPL) इस नेटवर्क का संचालन करती है। इसे दुनिया के तीन अलग-अलग कोनों में 120 डिग्री की दूरी पर स्थापित किया गया है।
- पहला केंद्र: गोल्डस्टोन, कैलिफोर्निया (अमेरिका)
- दूसरा केंद्र: मैड्रिड (स्पेन)
- तीसरा केंद्र: कैनबरा (ऑस्ट्रेलिया)
इन केंद्रों को इस तरह चुना गया है कि पृथ्वी के घूमने पर भी अंतरिक्ष यान कभी नजरों से ओझल न हो। जब यान एक केंद्र की रेंज से बाहर जाता है, तो दूसरा केंद्र तुरंत उसका सिग्नल पकड़ लेता है।
70 मीटर ऊंचे डिश एंटीना का कमाल
डीएसएन कैसे काम करता है, यह समझना दिलचस्प है। इसमें विशाल पैराबॉलिक डिश एंटीना लगे हैं। इनमें सबसे बड़ा एंटीना 70 मीटर व्यास का है। यह अरबों किलोमीटर दूर से आने वाले बेहद कमजोर रेडियो सिग्नलों को भी आसानी से पकड़ लेता है। ये एंटीना न सिर्फ यानों को कमांड भेजते हैं, बल्कि वहां से आने वाली हाई-क्वालिटी तस्वीरें और वैज्ञानिक डेटा भी पृथ्वी तक पहुंचाते हैं।
सिर्फ बातचीत ही नहीं, रडार का भी काम
डीएसएन सिर्फ कम्युनिकेशन का जरिया नहीं है। यह रडार और रेडियो एस्ट्रोनॉमी में भी बड़ी भूमिका निभाता है। वैज्ञानिक इसकी मदद से एस्टेरॉयड (क्षुद्रग्रहों) और चंद्रमाओं के अंदरूनी हिस्सों की जांच करते हैं। यह नेटवर्क सौर मंडल की गहराइयों और ब्रह्मांड की संरचना को समझने में वैज्ञानिकों की सीधी मदद कर रहा है।
भविष्य के मिशनों की लाइफलाइन
आज नासा के लगभग सभी गहरे अंतरिक्ष मिशन इसी नेटवर्क पर टिके हैं। मंगल पर चल रहे रोवर हों या सौर मंडल के बाहर जा चुका वॉयेजर यान, सबका संपर्क डीएसएन से ही संभव है। भविष्य में जब इंसान दोबारा चंद्रमा पर कदम रखेगा या मंगल की यात्रा करेगा, तब यह नेटवर्क ही उनकी लाइफलाइन बनेगा। इसके बिना अंतरिक्ष की गहराइयों में झांकना लगभग असंभव होता।


