Science News: चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण शोध सामने आया है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि मस्तिष्क में आयरन की अत्यधिक मात्रा न्यूरॉन्स की प्राकृतिक सुरक्षा प्रणाली को कमजोर कर देती है। इससे हमारे मस्तिष्क की कोशिकाएं तनाव और बाहरी सेलुलर नुकसान के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती हैं। वैज्ञानिकों ने इस पूरी प्रक्रिया को ‘क्रोनोफेरोप्टोसिस’ नाम दिया है।
आयरन की अधिकता से खत्म होता है एंटीऑक्सीडेंट प्रोटीन
प्रसिद्ध शोध पत्रिका ‘सेल डेथ डिस्कवरी’ में प्रकाशित निष्कर्षों के अनुसार, अतिरिक्त आयरन मस्तिष्क की कोशिकाओं की रक्षा करने वाले बेहद जरूरी एंटीऑक्सीडेंट प्रोटीन को पूरी तरह खत्म कर देता है। इसके परिणामस्वरूप मस्तिष्क की कोशिकाएं बाहरी तनावों के सामने बेअसर और कमजोर हो जाती हैं। यह संचय न्यूरोडीजेनेरेशन रोगों की रोकथाम और सटीक इलाज में एक बड़ा लक्ष्य साबित हो सकता है।
अमेरिका के साल्क इंस्टीट्यूट फॉर बायोलॉजिकल स्टडीज के शोध प्रोफेसर पाम माहेर ने इस विषय पर विस्तार से जानकारी दी है। उन्होंने बताया कि अल्जाइमर और अन्य न्यूरोडीजेनेरेटिव विकारों के संदर्भ में मस्तिष्क का लचीलापन एक बेहद महत्वपूर्ण विषय बन गया है। जब आयरन एक निश्चित स्तर से ऊपर पहुंचता है, तो कोशिकाएं अपना लचीलापन खो देती हैं।
लंबे समय तक रहने वाला फेरोप्टोटिक स्ट्रेस पहुंचाता है चोट
पूर्व के अध्ययनों से स्पष्ट हुआ है कि उम्र बढ़ने के साथ आयरन धीरे-धीरे न्यूरॉन्स के अंदर जमा होने लगता है। जीवन के शुरुआती चरण में इसका न्यूरॉन की कार्यप्रणाली पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ता है, लेकिन बाद के चरणों में यही संचय न्यूरोनल मृत्यु का कारण बनता है। लंबे समय तक आयरन की अधिकता से फेरोप्टोटिक स्ट्रेस की गंभीर स्थिति पैदा होती है।
इस स्थिति में नर्व सेल्स जीवित तो रहती हैं, लेकिन वे ऑक्सीडेटिव चोट के प्रति अत्यंत संवेदनशील हो जाती हैं। साल्क इंस्टीट्यूट के मुख्य लेखक नवाब जान डार के अनुसार, इन कोशिकाओं का भविष्य केवल आयरन की मात्रा से तय नहीं होता, बल्कि इस बात से तय होता है कि वे कितने समय तक इस खतरनाक तनावपूर्ण स्थिति में बनी रहती हैं।
भविष्य में न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों से बचाव की जगी उम्मीद
वैज्ञानिकों का मानना है कि इस महत्वपूर्ण खोज के बाद अब चिकित्सा जगत में ऐसे प्रभावी उपाय और दवाएं विकसित की जा सकती हैं, जो मस्तिष्क के कमजोर होने की स्थिति में सहायता प्रदान करेंगी। जब आयरन का अत्यधिक जमाव न्यूरॉन्स पर अतिरिक्त दबाव डालने लगता है, तब इन उन्नत तकनीकों से आयरन के असंतुलन को समय रहते ठीक किया जा सकेगा।
आयरन आमतौर पर हमारे दैनिक आहार जैसे हरे पत्तेदार साग, स्टार्च वाले अनाज, लीन मीट और समुद्री भोजन में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। शोधकर्ताओं को पूरी उम्मीद है कि इस नई खोज से न्यूरॉन्स को लंबे समय तक मजबूत बनाए रखने और अल्जाइमर जैसी गंभीर बीमारियों की समय से पहले भविष्यवाणी कर उनके सटीक उपचार में बड़ी मदद मिलेगी।

