दक्षिण अमेरिकी देश वेनेजुएला में भूकंप का भयंकर तांडव, दो भीषण झटकों से मची तबाही में 235 लोगों की मौत

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Caracas News: दक्षिण अमेरिकी देश वेनेजुएला बुधवार को भूकंप की भीषण तबाही से पूरी तरह दहल उठा है। कुछ ही मिनटों के फासले पर आए दो ताकतवर और विनाशकारी भूकंपों ने भारी तबाही मचाई है। इस आपदा में अब तक कम से कम 235 लोगों की मौत हो चुकी है।

इस भीषण जलजले के कारण वहां 1,500 से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल बताए जा रहे हैं। भूकंप की वजह से बड़ी संख्या में बहुमंजिला इमारतें जमींदोज हो गई हैं। मलबे में दबे लोगों को बाहर निकालने के लिए रेस्क्यू ऑपरेशन लगातार चलाया जा रहा है।

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पिछले 100 वर्षों का सबसे शक्तिशाली और विनाशकारी भूकंप

अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (यूएसजीएस) के अनुसार पहला भूकंप 7.2 और दूसरा 7.5 तीव्रता का था। विशेषज्ञों का मानना है कि यह वेनेजुएला में पिछले 100 साल से भी अधिक समय में आया सबसे शक्तिशाली भूकंप है। प्रभावित इलाकों में सेना और राहत एजेंसियां युद्धस्तर पर जुटी हैं।

वेनेजुएला की इस बड़ी त्रासदी के बाद एक बार फिर यह गंभीर सवाल उठने लगा है कि क्या भूकंप आने से पहले लोगों को अलर्ट किया जा सकता है? यदि भारत में कभी ऐसा खतरनाक भूकंप आए तो क्या हमारे पास कोई मजबूत सिक्योरिटी सिस्टम मौजूद है?

वास्तव में भारत के भूवैज्ञानिक हिमालयी क्षेत्र में बेहद भीषण भूकंप की चेतावनी लगातार देते रहे हैं। हिमालय पर्वत शृंखला भारत और यूरेशिया जैसी टेक्टॉनिक प्लेटों के मिलने से बनी थी। इसे धरती के भीतर की प्लेटों में होने वाली हलचल का बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।

दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में भीषण भूकंप का लगातार खतरा

भूवैज्ञानिकों ने भूकंप संभावित क्षेत्रों को पांच सीस्मिक जोन में पूरी तरह बांटा हुआ है। जोन-1 में भूकंप आने की आशंका सबसे कम रहती है, वहीं जोन-5 में यह सबसे ज्यादा प्रबल होती है। दिल्ली-एनसीआर का पूरा इलाका सीस्मिक जोन-4 के अंतर्गत आता है।

यही मुख्य वजह है कि राजधानी में भीषण भूकंप का खतरा हमेशा बना रहता है। एक्सपर्ट्स को आशंका है कि यहां 9.0 तक की तीव्रता वाला भूकंप आ सकता है। फिलहाल दुनिया के किसी भी देश के पास ऐसी एडवांस टेक्नोलॉजी नहीं है जो भूकंप की सटीक भविष्यवाणी कर सके।

हालांकि भूकंप शुरू होने के बाद कुछ सेकंड पहले चेतावनी देने वाला अर्थक्वेक अर्ली वार्निंग सिस्टम जरूर विकसित किया गया है। जब भूकंप आता है तो सबसे पहले पी-वेव (प्राइमरी वेव) निकलती है। यह सबसे तेज चलती है लेकिन इसका असर काफी कम होता है।

सेंसर नेटवर्क और आधुनिक एल्गोरिद्म पर काम कर रहा भारत

इसके कुछ सेकंड बाद अधिक शक्तिशाली और नुकसान पहुंचाने वाली एस-वेव (सेकेंडरी वेव) पहुंचती है। अर्ली वार्निंग सिस्टम जमीन में लगाए गए सेंसरों के जरिए पी-वेव को पकड़ लेता है। इसके बाद यह तुरंत कंप्यूटर नेटवर्क के जरिए ऑनलाइन अलर्ट जारी कर देता है।

भारत में इस अर्ली वार्निंग सिस्टम पर तेजी से काम हो रहा है। आईआईटी रुड़की और उत्तराखंड सरकार ने मिलकर ‘भूदेव’ नाम का एक आधुनिक मोबाइल ऐप विकसित किया है। यह सिस्टम भूकंप शुरू होने के बाद शुरुआती झटकों का पता लगाकर लोगों तक वार्निंग पहुंचाता है।

इसके अलावा नेशनल सेंटर फॉर सीस्मोलॉजी (एनसीएस) भी पी-वेव की पहचान और संभावित झटकों का पूर्वानुमान लगाने वाले आधुनिक एल्गोरिद्म पर काम कर रहा है। फिलहाल भारत में सबसे ज्यादा सेंसर उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्र की एक्टिव फॉल्ट लाइंस पर लगाए गए हैं।

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