MP Waqf Board: मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति पर घमासान, सपा सांसद मोहिबुल्लाह नदवी ने उठाए सवाल

Bhopal News: मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड में दो हिंदू सदस्यों की नियुक्ति पर सियासी घमासान शुरू हो गया है। समाजवादी पार्टी के सांसद मोहिबुल्लाह नदवी ने इस फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि कानून बनते समय उनकी पार्टी ने संसद में इसका कड़ा विरोध किया था।

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सपा सांसद मोहिबुल्लाह नदवी ने भारतीय जनता पार्टी सरकार पर सीधा निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि सरकार को किसी के भी धार्मिक मामलों में सीधे हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। अगर वक्फ प्रबंधन में कोई सुधार करना था, तो उसके लिए दूसरे रास्ते भी अपनाए जा सकते थे।

धार्मिक मामलों में दखलअंदाजी का सपा सांसद ने किया विरोध

सांसद नदवी ने कहा कि हमने वक्फ संशोधन बिल पर बनी जेपीसी के सामने भी अपनी आपत्तियां दर्ज कराई थीं। लेकिन सरकार ने उन सुझावों को दरकिनार कर इस नए नियम को पास कर दिया। कानून और संविधान को ताक पर रखकर लगातार कार्रवाई की जा रही है।

सपा नेता ने दावा किया कि नया नियम लागू होने के बाद से सैकड़ों मस्जिदें गिराई जा रही हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि जिस देश में कानून का राज खत्म हो जाता है, वहां इंसानियत दम तोड़ देती है। ऐसी एकतरफा कार्रवाइयों से देश का विकास और आपसी भाईचारा पूरी तरह प्रभावित होता है।

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मुसलमानों के साथ बढ़ते भेदभाव पर जताई गंभीर चिंता

राम मंदिर का जिक्र करते हुए सपा सांसद ने कहा कि कोई भी सच्चा मुसलमान भगवान राम के लिए कभी अभद्र भाषा का इस्तेमाल नहीं करता है। कुछ असामाजिक तत्व पैसों के लालच में ऐसा कर सकते हैं। लेकिन आम मुसलमान हमेशा सभी धर्मों का पूरा सम्मान करता है।

उन्होंने सवाल उठाया कि ‘आई लव मोहम्मद’ लिखने पर कितने ही मुस्लिम युवकों को जेल में डाल दिया गया। समाज में अल्पसंख्यकों के खिलाफ भेदभाव लगातार बढ़ता जा रहा है। अगर इस भेदभाव को समय रहते नहीं रोका गया, तो यह भविष्य में देश के लिए नासूर बन जाएगा।

मध्य प्रदेश बना वक्फ बोर्ड का पुनर्गठन करने वाला पहला राज्य

बता दें कि मध्य प्रदेश सरकार ने नए वक्फ अधिनियम के तहत बोर्ड में कुल दस सदस्यों को शामिल किया है। इनमें दो गैर-मुस्लिम सदस्य मनोज मालपानी और अनिमेश भार्गव भी बतौर सदस्य नियुक्त हुए हैं। इसी के साथ मध्य प्रदेश नए कानून के तहत बोर्ड गठित करने वाला पहला राज्य बन गया है।

इससे पहले पुराने वक्फ अधिनियम १९९५ के तहत बोर्ड में केवल मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधि ही शामिल किए जाते थे। सरकार का तर्क है कि नए नियमों से बोर्ड के कामकाज में पारदर्शिता आएगी। हालांकि, विपक्ष इस बदलाव को धार्मिक स्वायत्तता पर सीधा हमला बता रहा है।

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