Moscow News: भारत और रूस ने अब अपने न्यायिक रिश्तों को एक नए मुकाम पर पहुंचा दिया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना और रूसी सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश इगोर क्रास्नोव के बीच मॉस्को में एक ऐतिहासिक बैठक हुई। इस दौरान दोनों देशों की सर्वोच्च अदालतों के बीच न्यायिक सहयोग बढ़ाने के लिए एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए।
रूसी सुप्रीम कोर्ट में बोलते हुए चीफ जस्टिस संजीव खन्ना ने कहा कि अलग-अलग कानूनी परंपराओं के बावजूद दोनों देशों की अदालतें समान चुनौतियों का सामना कर रही हैं। उन्होंने जोर दिया कि तेजी से हो रहे सामाजिक और तकनीकी बदलावों के बीच न्याय प्रणाली में जनता का भरोसा बनाए रखना सबसे बड़ी प्राथमिकता है।
न्यायिक फैसलों का विकल्प नहीं बन सकती मॉडर्न टेक्नोलॉजी
बैठक के दौरान भारतीय प्रतिनिधिमंडल की तरफ से तकनीक के सही इस्तेमाल पर विशेष बात की गई। जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि टेक्नोलॉजी को कभी भी न्यायिक फैसलों के विकल्प के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसका मुख्य काम न्याय तक आम जनता की पहुंच को और ज्यादा आसान और सुलभ बनाना है।
जस्टिस सूर्यकांत ने भारतीय न्यायपालिका में आ रहे डिजिटल बदलावों की पूरी जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि भारत में अदालतों को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और सुलभ बनाने के मिशन मोड पर काम चल रहा है। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के जरिए देश की पूरी अदालती व्यवस्था को तेजी से अपग्रेड किया जा रहा है।
न्यायपालिका में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते इस्तेमाल का जिक्र करते हुए उन्होंने एक बड़ी उपलब्धि बताई। भारत के सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी दस्तावेजों के अनुवाद के लिए ‘सुवास’ (SUVAS) नाम का एक एडवांस सॉफ्टवेयर टूल तैयार किया है। इसके जरिए अंग्रेजी में दिए गए फैसलों का 16 क्षेत्रीय भाषाओं में तुरंत अनुवाद किया जाता है।
एआई चैटबॉट और ‘वन केस वन डेटा’ से मिलेगी मदद
भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में लॉन्च हुए एआई-संचालित चैटबॉट ‘सु सहाय’ (Su Sahay) के बारे में भी रूसी जजों को बताया। यह खास चैटबॉट वकीलों, वादियों और आम नागरिकों को अदालती प्रक्रियाओं की सटीक जानकारी देता है। इसके जरिए केस स्टेटस और फाइलिंग से जुड़ी जरूरतें तुरंत पूरी हो जाती हैं।
इसके साथ ही भारतीय न्यायपालिका की अनोखी पहल ‘एक मामला, एक डेटा’ (One Case, One Data) पर भी विस्तार से चर्चा हुई। इस प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य देश के सभी न्यायिक प्लेटफॉर्म्स पर हर केस के लिए एक जैसा और मानकीकृत डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करना है ताकि पारदर्शिता बनी रहे।
जस्टिस सूर्यकांत ने बताया कि ऑनलाइन मध्यस्थता और सुलह को बढ़ावा देने के लिए भी आधुनिक तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। इससे अदालती काम में एफिशियंसी बढ़ेगी, खर्चों में कमी आएगी और पुराने विवादों का समय पर समाधान हो सकेगा। हालांकि, उन्होंने साफ किया कि न्याय की मूल आत्मा हमेशा मानवीय प्रयास ही रहेगी।
मशीनें कभी भी इंसानी विवेक की जगह नहीं ले सकतीं
भारतीय सर्वोच्च न्यायालय का मानना है कि एआई ट्रांसलेशन, ट्रांसक्रिप्शन और एडमिनिस्ट्रेटिव सपोर्ट में जजों की मदद जरूर कर सकता है। लेकिन यह कभी भी खुद फैसले नहीं सुना सकता। एआई न तो गवाहों की विश्वसनीयता परख सकता है और न ही साक्ष्यों का सटीक मूल्यांकन करने में सक्षम है।
जस्टिस सूर्यकांत ने अंत में सुप्रीम कोर्ट द्वारा नोटिफाई किए गए ड्राफ्ट रेगुलेशन का भी उल्लेख किया। ये नियम न्यायपालिका में एआई के सुरक्षित और जिम्मेदार इस्तेमाल के लिए बनाए गए हैं। इसका मुख्य मकसद न्यायिक स्वतंत्रता को बरकरार रखना और मशीनी सिस्टम पर हमेशा इंसानी निगरानी को पूरी तरह सुनिश्चित करना है।

