New Delhi News: आज भारत की डिफेंस पावर अब सिर्फ मिसाइलों की ताकत से नहीं, बल्कि उनके तेज प्रोडक्शन से तय होगी। रक्षा मंत्रालय की ड्राफ्ट डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर 2026 में प्राइवेट कंपनियों को मिसाइल निर्माण का मौका दिया गया है। यह नया सिस्टम आने वाले युद्ध के समय लगातार हथियारों की सप्लाई को सुनिश्चित करेगा।
आधुनिक युद्धों ने दुनिया के सामने एक नई और कठोर सच्चाई पेश की है। यूक्रेन से लेकर मिडल ईस्ट तक के संघर्षों में मिसाइलों ने एक निर्णायक रोल प्ले किया है। दुश्मन के राडार, एयर डिफेंस सिस्टम और सैन्य ठिकानों को तबाह करने के लिए ये हथियार सबसे प्रभावी और खतरनाक साबित हुए हैं।
चीन और पाकिस्तान के सामने नई सिक्योरिटी रणनीति की जरूरत
भारत के लिए यह बदलाव बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि हमारे सामने दो परमाणु संपन्न देश मौजूद हैं। चीन और पाकिस्तान के साथ बदलते सिक्योरिटी समीकरण भारत को नई रणनीति अपनाने पर मजबूर कर रहे हैं। अब हमें युद्ध के समय हजारों मिसाइलें तेजी से तैयार करने की कैपेसिटी हर हाल में हासिल करनी होगी।
अभी तक देश के मिसाइल सिस्टम में भारत डायनामिक्स लिमिटेड का लगभग एकाधिकार था। आकाश, नाग और अस्त्र जैसी कई सफल मिसाइलें इसी पुराने सिस्टम में तैयार हुई थीं। उस समय यह सेटअप सही था क्योंकि प्राइवेट इंडस्ट्री के पास तकनीकी क्षमता और प्रोडक्शन का बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर देश में मौजूद नहीं था।
नई ड्राफ्ट डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर 2026 इस पुरानी सोच को पूरी तरह बदल रही है। इसमें साफ तौर पर कहा गया है कि देश को सिर्फ हथियार बनाने तक सीमित नहीं रहना है। हमें स्वदेशी डिजाइन, इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी और को-डेवलपमेंट पर भी बहुत गहराई से फोकस करने की सख्त जरूरत है।
डिफेंस सेक्टर में प्राइवेट कंपनियों की एक दमदार एंट्री
इस नए प्रोजेक्ट के तहत कई प्राइवेट कंपनियों को स्ट्रैटेजिक मिसाइल प्रोजेक्ट्स में शामिल किया गया है। इनमें अडाणी डिफेंस, भारत फोर्ज और सोलर डिफेंस जैसी बड़ी कंपनियां शामिल हैं। हालांकि सरकारी कंपनियों को इस रेस से बाहर नहीं किया गया है, लेकिन अब उन्हें एक बहुत कड़ा कॉम्पिटिशन फेस करना होगा।
इस बड़े बदलाव का सबसे अहम स्ट्रैटेजिक फायदा यह है कि भारत युद्ध के दौरान अपने प्रोडक्शन को तेजी से बढ़ा सकेगा। मॉडर्न वॉरफेयर में मिसाइलों का इस्तेमाल बहुत तेजी से होता है जिससे स्टॉक तुरंत खत्म हो जाते हैं। कई कंपनियों के होने से वॉर के समय सप्लाई चेन लगातार बनी रहेगी।
डिफेंस सेक्रेटरी ने संकेत दिया है कि भविष्य में बैलिस्टिक मिसाइल प्रोडक्शन में भी प्राइवेट सेक्टर को शामिल किया जाएगा। यह भारत की स्ट्रैटेजिक पावर का बहुत सेंसिटिव हिस्सा माना जाता है। इसके साथ ही इंडियन आर्मी के भीतर एक खास रॉकेट फोर्स बनाने पर भी तेजी से और गंभीरता से चर्चा की जा रही है।
अगर यह नई रॉकेट फोर्स बनती है, तो सेना को भारी संख्या में एडवांस मिसाइलों की जरूरत पड़ेगी। इसका सीधा मतलब है कि आने वाले सालों में मिसाइल प्रोडक्शन को कई गुना बढ़ाना होगा। सिर्फ एक सरकारी कंपनी के भरोसे इस विशाल टारगेट को हासिल करना किसी भी तरह से मुमकिन नहीं होगा।
क्वालिटी कंट्रोल और सिक्योरिटी पर सरकार की कड़ी मॉनिटरिंग
यह नई व्यवस्था प्राइवेट इंडस्ट्री के लिए एक ऐतिहासिक मौका लेकर आई है। अब उन्हें सिस्टम इंटीग्रेशन और फुल प्रोडक्शन की बड़ी जिम्मेदारी दी जाएगी। सरकार ने इसके साथ ही सिक्योरिटी और क्वालिटी पर भी कड़ा कंट्रोल रखा है। हर कंपनी को कड़े टेक्निकल टेस्ट और क्वालिटी स्टैंडर्ड्स से गुजरना ही होगा।
इस पूरी डिफेंस स्ट्रैटेजी का एक और खास पहलू सात स्पेशल मैन्युफैक्चरिंग हब बनाना है। रक्षा मंत्रालय पूरे देश में ऐसे इंडस्ट्रियल क्लस्टर डेवलप करेगा जो टेस्टिंग, क्वालिटी सर्टिफिकेशन और एक्सपोर्ट पर फोकस करेंगे। यह यूपी और तमिलनाडु के डिफेंस कॉरिडोर से अलग एक बहुत बड़ा और नेशनल लेवल का खास प्रोजेक्ट होगा।
इन हब्स में कर्नाटक पॉलिसी पर, महाराष्ट्र प्राइवेट पार्टनरशिप पर और यूपी टेस्टिंग पर काम करेगा। इसके साथ ही इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस और कई आईआईटी को भी इस मेगा प्रोजेक्ट से जोड़ा गया है। इसका मेन टारगेट देश भर में डिफेंस इनोवेशन का एक शानदार और बहुत मजबूत इकोसिस्टम तैयार करना है।
यह बड़ा बदलाव भारत के आत्मनिर्भर विजन को एक नई दिशा दे रहा है। पहले आत्मनिर्भरता का मतलब सिर्फ सरकारी कंपनियों के जरिए डोमेस्टिक प्रोडक्शन माना जाता था। लेकिन अब सरकार इसे एक व्यापक इंडस्ट्रियल पावर के रूप में देख रही है जहां पब्लिक और प्राइवेट सेक्टर मिलकर मजबूत डिफेंस इकोसिस्टम आसानी से बनाएं।
हालांकि इस नई और बड़ी व्यवस्था में सरकार के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। ज्यादा कंपनियों के आने से बेहतर कोआर्डिनेशन और सख्त टेक्निकल डिसीप्लिन बनाए रखना बहुत मुश्किल काम होगा। जटिल वेपन सिस्टम के निर्माण के लिए बहुत ज्यादा एक्यूरेसी और रिलायबिलिटी चाहिए होती है जिसे मेंटेन करना बेहद जरूरी है।
इन सभी रिस्क फैक्टर को लेकर रक्षा मंत्रालय पूरी तरह से अलर्ट है। सरकार का स्पष्ट मानना है कि कंट्रोल्ड कॉम्पिटिशन और सख्त मॉनिटरिंग के जरिए इन सभी चुनौतियों को आसानी से संभाला जा सकता है। हर स्टेप पर क्वालिटी एश्योरेंस टीम्स बारीकी से नजर रखेंगी ताकि हथियारों के प्रोडक्शन में कोई कमी न रहे।
डिफेंस सेक्टर में आई यह नई क्रांति मॉडर्न भारत की वह कहानी है जो फ्यूचर वॉरफेयर को जीतना चाहता है। यह विशाल इंडस्ट्रियल पावर और लगातार प्रोडक्शन कैपेसिटी से ही संभव होगा। प्रधानमंत्री की लीडरशिप में डिफेंस सेक्टर में आत्मनिर्भरता अब सिर्फ एक नारा नहीं बल्कि एक बड़ा और विजनरी नेशनल मिशन बन चुका है।

