मौत से ठीक पहले औरंगज़ेब को सताने लगा था अपने पापों का डर, बेटों को लिखी चिट्ठियों में खोले कई बड़े राज!

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New Delhi News: मुगल इतिहास में औरंगज़ेब को एक बेहद क्रूर और निरंकुश शासक के रूप में याद किया जाता है। उसने अकबर की तरह ही हिंदुस्तान पर करीब 49 साल तक शासन किया था। लेकिन अपनी धार्मिक कट्टरता के कारण उसने मुल्क को लगातार युद्ध की आग में झोंके रखा।

सत्ता की हवस में अपने पिता शाहजहां को कैद करने और अपने तीन सगे भाइयों का बेरहमी से कत्ल करने वाला औरंगज़ेब अपने आखिरी दिनों में बेहद अकेला हो चुका था। उसकी मौत से ठीक पहले बेटों को लिखी गई भावुक चिट्ठियां और उसकी वसीयत इस दर्द को साफ बयां करती हैं।

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अकेले आया था और अब सिर्फ पापों की भारी गठरी साथ ले जा रहा हूं

इतिहासकार यदुनाथ सरकार की किताब के अनुसार, औरंगज़ेब ने अपने बेटे आज़म को पत्र में लिखा कि बुढ़ापा और कमजोरी बहुत बढ़ गई है। मैं इस दुनिया में अकेला आया था और अब अकेला ही वापस जा रहा हूं। खुदा की इबादत के अलावा जो भी समय बीता, उसमें सिर्फ दुख मिला।

उसने आगे लिखा कि वह न तो सल्तनत पर ठीक से हुकूमत कर पाया और न ही अपनी प्रजा का ख्याल रख सका। उसकी कीमती जिंदगी पूरी तरह बेकार चली गई। उसने दर्द बयां करते हुए लिखा कि वह अपने साथ सिर्फ किए गए पापों की भारी गठरी लेकर जा रहा है।

दुनिया के लोगों पर कभी भी आंखें मूंदकर भरोसा मत करना

अपने दूसरे बेटे कामबख्श को लिखी चिट्ठी में भी औरंगज़ेब ने अपनी लाचारी जाहिर की थी। उसने लिखा कि मैंने हर मुमकिन कोशिश की, लेकिन किसी ने मेरी बात नहीं सुनी। जो कुकर्म मैंने जीवन में किए हैं, उसका भारी बोझ अब मुझे अकेले ही उठाना पड़ेगा।

उसने अपने बेटों को नसीहत दी कि दुनियावी लोग हमेशा धोखा देते हैं, इसलिए उन पर कभी आंखें मूंदकर भरोसा मत करना। उसने प्रजा और किसानों की रक्षा करने की बात भी कही। उसे डर था कि प्रजा की बर्बादी की सजा सीधे खुदा के घर उसे भुगतनी पड़ेगी।

सगे भाइयों का कत्ल करने के बाद भी अंत तक सताता रहा दारा का डर

औरंगज़ेब की मौत के बाद उसके तकिये के नीचे से एक गुप्त वसीयत मिली थी। इस वसीयत में उसने अपने वारिसों को बारह महत्वपूर्ण नसीहतें दी थीं। इन्हें लिखते समय भी उसके दिमाग पर अपने सगे भाई दारा शिकोह के प्रति पिता शाहजहां के प्रेम की कड़वाहट साफ दिख रही थी।

उसने वसीयत में साफ लिखा कि कभी भी अपने पुत्रों पर हद से ज्यादा भरोसा न करें और न ही उनसे ज्यादा नजदीकी बढ़ाएं। उसने उदाहरण दिया कि अगर सम्राट शाहजहां ने दारा शिकोह के प्रति इतनी तरफदारी न दिखाई होती, तो दारा का अंत इतना दर्दनाक कभी नहीं होता।

शिवाजी महाराज के कैद से भागने की बड़ी लापरवाही को माना अपनी हार

एक कामयाब शासक बनने के लिए औरंगज़ेब ने अपनी वसीयत में लिखा कि राजा को हमेशा चौकन्ना रहना चाहिए और लगातार घूमते रहना चाहिए। उसने माना कि उसकी जरा सी लापरवाही के कारण ही छत्रपति शिवाजी महाराज उसकी कैद से भागने में पूरी तरह सफल रहे थे।

इसी वजह से उसे अपने जीवन के अंतिम समय तक मराठों के साथ लगातार युद्ध लड़ना पड़ा था। इसके अलावा उसने शासन चलाने के लिए ईरानी मुलाजिमों और युद्ध के मैदान के लिए तूरानी सैनिकों को मुगल साम्राज्य का सबसे वफादार और भरोसेमंद साथी बताया था।

टोपियों की सिलाई और कुरान की नकल से कमाए पैसों से हुआ कफ़न

औरंगज़ेब अपने अंतिम समय में शाही खजाने का पैसा अपने कफ़न-दफ़न पर खर्च नहीं करना चाहता था। उसने लिखा था कि खुद हाथ से सिली हुई टोपियों से बचे मात्र चार रुपये और दो आने ही उसके कफ़न पर पूरी सादगी के साथ खर्च किए जाएं।

इसके अलावा कुरान की नकल बेचकर कमाए गए 305 रुपये को उसने गरीबों में बांटने की हिदायत दी थी। उसने अपने जनाजे के साथ गवैय्यों के जुलूस पर पूरी तरह पाबंदी लगाई थी। वह चाहता था कि उसकी कब्र को बेहद सादा और खुला रखा जाए।

Author: Gaurav Malhotra

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