Business News: भारतीय कॉर्पोरेट जगत और शेयर बाजार से इस वक्त की सबसे बड़ी खबर सामने आ रही है। बाजार नियामक सेबी (SEBI) ने सोने की रिफाइनिंग और आभूषण निर्माण क्षेत्र की दिग्गज कंपनी ‘राजेश एक्सपोर्ट्स लिमिटेड’ (REL) और इसके प्रमोटर राजेश मेहता पर 15.15 लाख करोड़ रुपये (158 अरब डॉलर) की वित्तीय हेराफेरी का गंभीर आरोप लगाया है।
इस अप्रत्याशित और भारी-भरकम आंकड़े के कारण ही इस कथित घोटाले की तुलना भारत के कई वर्षों के कुल रक्षा बजट से की जा रही है। सेबी की इस बड़ी कार्रवाई को देश के इतिहास के सबसे बड़े ‘एकाउंटिंग घोटालों’ में से एक माना जा रहा है। इस खुलासे के बाद से ही पूरे बिजनेस जगत में हड़कंप मच गया है।
अर्श से फर्श पर आए गोल्ड किंग राजेश मेहता
राजेश मेहता साल 1995 में शेयर बाजार में लिस्ट हुई कंपनी ‘राजेश एक्सपोर्ट्स लिमिटेड’ के संस्थापक और एग्जीक्यूटिव चेयरमैन हैं। राजेश मेहता को दशकों तक एक ऐसे बेहद कामयाब भारतीय उद्यमी के तौर पर देखा जाता रहा, जिन्होंने अपने छोटे से पारिवारिक बिजनेस को दुनिया की सबसे बड़ी गोल्ड प्रोसेसिंग और एक्सपोर्टिंग कंपनियों में से एक बना दिया।
बेंगलुरु के जैन कारोबारी परिवार में जन्मे राजेश मेहता ने 1988 में अपने भाई प्रशांत मेहता के साथ पारिवारिक रिटेल ज्वेलरी बिजनेस शुरू किया था। महज दो साल में दोनों भाइयों ने देश की पहली ‘ऑर्गेनाइज्ड गोल्ड ज्वेलरी मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी’ खड़ी कर दी। साल 1994 तक राजेश एक्सपोर्ट्स देश की सबसे बड़ी गोल्ड ज्वेलरी निर्यातक बन चुकी थी।
साल 2015 में राजेश मेहता के करियर का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट आया, जब उन्होंने प्रसिद्ध स्विस रिफाइनरी ‘वालकाम्बी’ (Valcambi) का रणनीतिक अधिग्रहण किया। इस वैश्विक डील ने उन्हें दुनिया की सबसे बड़ी गोल्ड रिफाइनिंग फैसिलिटी का पूरा कंट्रोल दे दिया। कंपनी का दावा है कि वह दुनिया के कुल सोने के उत्पादन का 35% हिस्सा खुद प्रोसेस करती है।
सेबी ने जांच के बाद क्या लगाए गंभीर आरोप?
सेबी ने अपने अंतरिम आदेश में आरोप लगाया है कि वित्त वर्ष 2021 से 2025 के बीच राजेश एक्सपोर्ट्स ने अपनी कुल कमाई को लगभग 15.15 लाख करोड़ रुपये बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया। नियामक के मुताबिक, कंपनी की विदेशी सब्सिडियरी कंपनियों द्वारा रिपोर्ट की गई कुल कमाई का लगभग 99.8% हिस्सा पूरी तरह फर्जी या बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया हो सकता है।
जांच में यह भी सामने आया कि कंपनी के 97 से 99% रेवेन्यू का स्वतंत्र रूप से सत्यापन नहीं किया जा सका, क्योंकि ये सभी विदेशी संस्थाओं के संदिग्ध लेन-देन से जुड़े थे। इन गंभीर आरोपों के बाद सेबी ने जांच पूरी होने तक राजेश मेहता के शेयर बाजार में किसी भी तरह की सिक्योरिटीज खरीदने, बेचने या डील करने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है।
इसके साथ ही सेबी ने कंपनी के सभी खातों और लेन-देन के लिए नए सिरे से गहन ‘फोरेंसिक ऑडिट’ का भी कड़ा आदेश जारी किया है। नियामक का सीधा आरोप है कि कंपनी की 99.80% विदेशी कमाई केवल कागजों पर ही दिखाई गई थी, जिसका जमीन पर कोई ठोस व्यावसायिक आधार या सबूत जांच में नहीं मिला।
निजी सट्टेबाजी के लिए शेल खातों का खेल
सेबी की जांच में अहमदाबाद की एक छोटी ब्रोकिंग फर्म ‘एफ्लुएंस शेयर्स एंड स्टॉक्स प्राइवेट लिमिटेड’ का नाम प्रमुखता से उभरा है। राजेश एक्सपोर्ट्स ने कागजों पर दिखाया कि उसने एफ्लुएंस के साथ 11,487 करोड़ रुपये की बड़ी बिक्री और 11,488 करोड़ रुपये की खरीदारी की है। चौंकाने वाली बात यह है कि GST रिकॉर्ड्स में ऐसा कोई लेनदेन दर्ज ही नहीं है।
सेबी का दावा है कि ये 11,400 करोड़ रुपये से अधिक की फर्जी अकाउंटिंग एंट्रीज सिर्फ कंपनी का टर्नओवर फुलाने और राजेश मेहता की निजी डेरिवेटिव ट्रेडिंग (शेयर सट्टेबाजी) को छिपाने के लिए की गईं। बिना बोर्ड की मंजूरी के कंपनी के 338.90 करोड़ रुपये राजेश मेहता से जुड़े निजी खातों में ट्रांसफर किए गए, ताकि उनके व्यक्तिगत नुकसान की भरपाई हो सके।
कंपनी की सफाई के बाद भी शेयर धड़ाम
सेबी की इस ताबड़तोड़ कार्रवाई के बाद घरेलू शेयर बाजार में राजेश एक्सपोर्ट्स के शेयरों में 5% का लोअर सर्किट लग गया और शेयर धड़ाम हो गए। हालांकि, आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए राजेश एक्सपोर्ट्स ने बयान जारी कर कहा कि उनके द्वारा दी गई रेवेन्यू की जानकारी बिल्कुल सही है और सेबी को कोई बड़ी ‘गलतफहमी’ हुई है।
कंपनी ने सफाई दी कि सेबी ने वालकाम्बी के ‘EBITDA’ (ऑपरेटिंग प्रॉफिट) को ही गलती से कुल रेवेन्यू समझ लिया है, जिस वजह से यह बड़ा अंतर दिख रहा है। कंपनी ने इसे सिर्फ एक ‘कम्युनिकेशन गैप’ बताया है। प्रबंधन ने कहा है कि वे सेबी के साथ पूरा सहयोग करते हुए जल्द ही सभी जरूरी वित्तीय दस्तावेज उनके समक्ष सौंपेंगे।
कॉर्पोरेट गवर्नेंस और LIC के निवेश पर उठे सवाल
राजेश एक्सपोर्ट्स का टर्नओवर तो हमेशा से बहुत बड़ा रहा है, लेकिन उनका वास्तविक प्रॉफिट मार्जिन बेहद कम रहा है। उदाहरण के तौर पर, वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी का कुल टर्नओवर 9,188.8 करोड़ रुपये था, लेकिन नेट प्रॉफिट मात्र 32.09 करोड़ रुपये रहा। इस खुलासे के बाद कंपनी के ऑडिटर्स और कॉर्पोरेट गवर्नेंस पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
इस कंपनी में प्रमोटर्स की कुल हिस्सेदारी 54.55% है। वहीं, देश की सबसे बड़ी सरकारी बीमा कंपनी भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) की भी इसमें 10.80% की बड़ी हिस्सेदारी है। शेयर बाजार के विशेषज्ञ अब इस बात पर सवाल उठा रहे हैं कि आखिर एलआईसी जैसे बड़े संस्थागत निवेशकों ने निवेश से पहले कंपनी के फाइनेंशियल्स की पर्याप्त जांच क्यों नहीं की।
Author: Rajesh Kumar

