Business News: भारतीय रिजर्व बैंक देश में जल्द ही प्लास्टिक के नोट पेश करने की तैयारी कर रहा है। केंद्रीय बैंक पॉलीमर यानी प्लास्टिक करेंसी नोट लाने के प्रस्ताव पर एक बार फिर गंभीरता से विचार कर रहा है। पटना और मुंबई में हुई हालिया बोर्ड बैठकों में यह अहम मुद्दा उठा है।
आरबीआई का यह नया कदम देश में करेंसी प्रबंधन से जुड़े साफ आंकड़ों पर आधारित है। आंकड़ों के अनुसार भारत में नोट छापने की लागत लगातार बहुत ऊंची बनी हुई है। इसके साथ ही कागजी नोटों के बहुत जल्दी खराब होने की समस्या भी देश के सामने है।
जानिए आखिर क्या होते हैं ये प्लास्टिक नोट
कागजी करेंसी के मुकाबले पॉलीमर या प्लास्टिक से बने नोट बहुत ज्यादा मजबूत और टिकाऊ होते हैं। इन खास नोटों पर पानी, गंदगी और नमी का कोई असर नहीं पड़ता है। भारत की विविध जलवायु और नोटों के इस्तेमाल के तरीकों को देखते हुए यह बेहद जरूरी है।
इन प्लास्टिक नोटों की उम्र बहुत लंबी होती है जिससे केंद्रीय बैंक को बार-बार नए नोट छापने की जरूरत नहीं पड़ेगी। हालांकि इनके शुरुआती उत्पादन का खर्च थोड़ा ज्यादा होता है। लेकिन लंबे समय में यह तकनीक नोटों की कुल छपाई लागत को काफी कम कर देती है।
भारत में करेंसी छापने पर आता है भारी खर्च
आरबीआई के ताजा आंकड़ों से पता चलता है कि देश में करेंसी नोट छापने पर होने वाला सालाना खर्च वित्त वर्ष 2024-25 में बढ़कर 6,372 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था। इसके बाद वित्त वर्ष 2025-26 में यह खर्च घटकर 4,875 करोड़ रुपये रहा।
इससे पहले वित्त वर्ष 2016-17 में नोट छपाई की लागत बढ़कर 7,965 करोड़ रुपये के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई थी। हालांकि वह साल देश में हुई अचानक नोटबंदी और नए डिजाइन के करेंसी नोटों को बड़े पैमाने पर जारी करने की वजह से एक बड़ा अपवाद था।
कागजी नोटों के साथ जुड़ी हैं बड़ी समस्याएं
देश में केवल नए नोट छापना ही एकमात्र बड़ी चुनौती नहीं है। सबसे बड़ी परेशानी बाजार में मौजूद उन खराब और गंदे नोटों की भारी मात्रा से पैदा होती है। केंद्रीय बैंक को इन बेकार हो चुके नोटों को बदलने के लिए लगातार बड़ा अभियान चलाना पड़ता है।
वित्त वर्ष 2025-26 में चलन से हटाए गए नोटों में सबसे ज्यादा संख्या 500 और 100 रुपये के नोटों की थी। आंकड़ों के अनुसार इस अवधि में करीब 598.3 करोड़ रुपये के 500 वाले नोट और 581.1 करोड़ रुपये के 100 वाले नोट नष्ट किए गए थे।
दुनिया के कई देशों में सफल है यह तकनीक
वैश्विक स्तर पर कागजी नोटों को बदलने का यह आधुनिक बदलाव काफी पहले से चल रहा है। वर्तमान में दुनिया के 60 से ज्यादा देश प्लास्टिक बैंकनोट का सफलतापूर्वक इस्तेमाल कर रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया पॉलीमर करेंसी को दुनिया में पहली बार पेश करने वाला पहला देश था।
दुनिया की अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं जैसे कनाडा, सिंगापुर, मलेशिया, थाईलैंड, इंडोनेशिया और रोमानिया में भी प्लास्टिक नोट चलते हैं। ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और ब्रिटेन जैसे विकसित देश तो पूरी तरह से पॉलीमर करेंसी को अपना चुके हैं, जबकि भारत अभी भी कागजी नोटों पर निर्भर है।
भारत ने पहले भी किया था इसका परीक्षण
भारतीय रिजर्व बैंक ने इससे पहले साल 2012 में देश के कुछ शहरों में पॉलीमर नोटों का फील्ड टेस्ट किया था। हालांकि उस समय यह विशेष पहल केवल पायलट स्टेज तक ही सीमित रही और इसे पूरे देश में आगे नहीं बढ़ाया जा सका था।
अब आरबीआई लागत और टिकाऊपन की गंभीर चुनौतियों को देखते हुए इस प्रस्ताव की दोबारा सक्रिय समीक्षा कर रहा है। भारत के लिए अब चुनौती सिर्फ नए नोट छापने की नहीं बल्कि करेंसी के रखरखाव पर होने वाले भारी खर्च को कम करने की है।
Author: Rajesh Kumar

