433 साल तक नहीं होगी चार्जिंग की जरूरत, NASA की इस महा-बैटरी ने दुनियाभर में मचाई खलबली

Technology News: अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा और ब्रिटेन की लेस्टर यूनिवर्सिटी ने एक नई क्रांति की शुरुआत की है। वैज्ञानिक एक ऐसी खास न्यूक्लियर बैटरी बना रहे हैं। यह बैटरी लगातार चार सौ तैंतीस साल तक बिना रुके बिजली देगी। इस नई तकनीक से गहरे अंतरिक्ष मिशनों की सबसे बड़ी चुनौती अब खत्म हो जाएगी। वहां सोलर पैनल सूरज की रोशनी के बिना काम नहीं कर पाते हैं। भविष्य में यह शक्तिशाली बैटरी पृथ्वी पर भी बड़े काम आ सकती है।

अंतरिक्ष मिशनों में ऊर्जा की सबसे बड़ी समस्या

अंतरिक्ष यान जब सूर्य से बहुत ज्यादा दूर चले जाते हैं, तो सोलर पैनल बेकार हो जाते हैं। बृहस्पति और शनि जैसे ग्रहों के पास सूरज की रोशनी बहुत ही ज्यादा कमजोर हो जाती है। इतनी दूरी पर प्रकाश की तीव्रता काफी तेजी से घटती है। ठंडे वातावरण और धूल के कारण वहां मशीनों का रखरखाव भी पूरी तरह असंभव होता है। इसीलिए नासा जैसी बड़ी एजेंसियां अब न्यूक्लियर बैटरियों की ओर अपना पूरा ध्यान तेजी से लगा रही हैं।

प्लेटोनियम के भरोसे चल रहे हैं कई पुराने मिशन

पिछले कई दशकों से प्लूटोनियम दो सौ अड़तीस इन खास न्यूक्लियर बैटरियों का सबसे मुख्य ईंधन रहा है। इसकी आधी उम्र करीब अट्ठासी साल तक होती है। इसका मतलब है कि यह समय के साथ धीरे-धीरे अपनी ऊर्जा को कम करता है। 1977 में लॉन्च हुए वॉयेजर मिशन आज भी इसी प्लूटोनियम ईंधन से सफलतापूर्वक चल रहे हैं। मंगल ग्रह पर काम कर रहे क्यूरियोसिटी और पर्सिवियरेंस रोवर भी इसी पुरानी तकनीक पर पूरी तरह से निर्भर बने हुए हैं।

अमेरिशियम से आई अंतरिक्ष की दुनिया में बड़ी क्रांति

वैज्ञानिकों ने अब अमेरिशियम दो सौ इकतालीस पर अपना पूरा ध्यान लगाया है। इस नए तत्व की आधी उम्र करीब चार सौ तैंतीस साल की होती है। यह प्लूटोनियम के मुकाबले बहुत ही ज्यादा धीरे खत्म होता है। यह लंबे समय तक बहुत स्थिर बिजली देता है। नासा और लेस्टर यूनिवर्सिटी ने इसका अहम परीक्षण शुरू कर दिया है। इसे खतरनाक न्यूक्लियर कचरे से बड़ी आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। यह एक काफी सस्ता और बेहतरीन विकल्प है।

आखिर कैसे काम करती है यह नई न्यूक्लियर बैटरी?

रेडियोआइसोटोप पावर सिस्टम में रेडियोएक्टिव तत्व को बहुत सुरक्षित रखा जाता है। इसके लगातार टूटने से काफी तेज गर्मी पैदा होती है। इस गर्मी को खास कन्वर्टर के जरिए सीधे बिजली में बदल दिया जाता है। नई तकनीक में पिस्टन बिना किसी घर्षण के आसानी से काम करते हैं। तापमान के अंतर से ये लगातार हिलते रहते हैं और बिजली पैदा करते हैं। परीक्षणों में यह मशीन बिना मरम्मत के लगातार चौदह साल से ज्यादा चल चुकी है।

भविष्य में धरती पर भी होगा तकनीक का बड़ा इस्तेमाल

यह अनोखी तकनीक सिर्फ अंतरिक्ष तक ही सीमित नहीं रहने वाली है। भविष्य में इस पावर सिस्टम का इस्तेमाल पृथ्वी पर भी खूब होगा। सुदूर और दुर्गम इलाकों में यह बैटरी काफी उपयोगी साबित होगी। यह आपदा प्रबंधन और लंबे समय तक चलने वाले उपकरणों को मजबूत जीवन देगी। दुनिया के बहुत से देश फिलहाल भयंकर ऊर्जा संकट से जूझ रहे हैं। यह तकनीक ऊर्जा की इस बड़ी किल्लत को हमेशा के लिए दूर करने का रास्ता दिखाएगी।

तेजी से बढ़ते वैश्विक ऊर्जा संकट का मिलेगा पक्का समाधान

होर्मुज स्ट्रेट की नाकेबंदी और युद्धों ने भारी ऊर्जा संकट पैदा किया है। दुनिया भर में तेल और रसोई गैस की सप्लाई काफी बाधित हुई है। आम लोग अब पारंपरिक चूल्हों की जगह इंडक्शन का इस्तेमाल करने लगे हैं। पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों की कीमत बहुत ज्यादा बढ़ गई है। यह न्यूक्लियर बैटरी एक बहुत बड़ी और सकारात्मक उम्मीद लेकर आई है। विज्ञान की यह तरक्की इंसानी जीवन को पूरी तरह से बदलने की जबर्दस्त ताकत अपने अंदर रखती है।

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