Shimla News: हिमाचल प्रदेश में पंचायती राज संस्थाओं के इलेक्शन संपन्न हुए 38 दिन बीत चुके हैं। इसके बावजूद राज्य के कई हिस्सों में लोकल सेल्फ-गवर्नमेंट सिस्टम अभी तक पूरी तरह से एक्टिव नहीं हो पाया है। राज्य के 12 में से सात जिलों में जिला परिषद अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव अब तक अटका हुआ है।
सात बड़े जिलों में अभी तक नहीं मिले अध्यक्ष
प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार सूबे की 92 पंचायत समितियों में से 35 समितियों को अभी तक अपने लीडर्स नहीं मिले हैं। इस देरी का सीधा असर ऑफिशियल एडमिनिस्ट्रेटिव वर्क्स पर पड़ रहा है। इसके साथ ही नवनिर्वाचित जन प्रतिनिधियों के ऑनरेरियम, मिलने वाली सुविधाओं और विभिन्न प्रोजेक्ट्स के बजट आवंटन पर भी विपरीत प्रभाव पड़ रहा है।
राज्य के बड़े जिलों जैसे कांगड़ा, चंबा, ऊना, सोलन, कुल्लू, शिमला और लाहौल-स्पीति में अभी तक यह प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है। वर्तमान में केवल पांच जिलों में ही जिला परिषद के मुखिया चुने जा सके हैं। सरकारी नियमों के मुताबिक जिला परिषद अध्यक्ष को 25 हजार रुपये और उपाध्यक्ष को 19 हजार रुपये सैलरी मिलती है।
अध्यक्षों को मिलने वाली सरकारी सुविधाएं भी रुकीं
इसके विपरीत एक साधारण जिला परिषद मेंबर को हर महीने केवल 8,300 रुपये का फिक्स्ड ऑनरेरियम ही दिया जाता है। अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का यह वित्तीय लाभ उनके ऑफिशियल डिक्लेरेशन की डेट से ही लागू होता है। जिन जिलों में चुनाव नहीं हुए हैं, वहां के विजेता केवल मेंबर के रूप में मानदेय पा रहे हैं।
शीर्ष पद पर चुने जाने के बाद ही जन प्रतिनिधियों को ऑफिशियल व्हीकल और अन्य वीआईपी सुविधाएं मिलती हैं। इस समय प्रदेश के केवल पांच भाग्यशाली जिलों के जिला परिषद अध्यक्षों को ही ये वीआईपी राइट्स मिल पा रहे हैं। बाकी क्षेत्रों के नवनिर्वाचित जन प्रतिनिधि इन प्रशासनिक अधिकारों से पूरी तरह वंचित हैं।
ग्रामीण विकास योजनाओं के क्रियान्वयन में हो रही देरी
हिमाचल प्रदेश की कुल 92 ब्लॉक समितियों में से अब तक 57 में इलेक्शन प्रोसेस पूरा हो चुका है। शेष 35 ब्लॉक समितियों में यह महत्वपूर्ण प्रक्रिया अभी पेंडिंग है। पंचायत समिति अध्यक्ष को 12 हजार रुपये और उपाध्यक्ष को 9 हजार रुपये मासिक सैलरी मिलती है, जो उनके ऑफिशियल चार्ज लेने के दिन से लागू होती है।
चुनावों में हो रही इस देरी से ग्रामीण इलाकों के विकास कार्य पूरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। जिला परिषदों और ब्लॉक समितियों की रेगुलर मीटिंग्स नहीं हो पा रही हैं। नई विकास योजनाओं की लिस्ट तैयार करने, विभिन्न कमेटियों का गठन करने और महत्वपूर्ण सरकारी निर्णयों को लागू करने में लगातार बड़ी देरी हो रही है।

