Himachal Pradesh News: बदलती जीवनशैली के कारण अब हाई बीपी यानी उच्च रक्तचाप केवल बड़ों की बीमारी नहीं रही। शिमला में स्कूली बच्चों पर हुए एक नए मेडिकल रिसर्च ने सबको चौंका दिया है। प्रसिद्ध अस्पताल आईजीएमसी के बाल रोग विभाग ने इस विषय पर एक विस्तृत अध्ययन पूरा किया है।
इस ताजा अध्ययन के अनुसार शिमला के हर 10 में से एक स्कूली बच्चे में उच्च रक्तचाप की शुरुआती लक्षण मिले हैं। डॉक्टरों ने कुछ बच्चों में तो गंभीर रूप से स्थायी उच्च रक्तचाप की बीमारी भी दर्ज की है। यह चौंकाने वाली रिपोर्ट वर्ष 2026 में ही मेडिकल जर्नल में प्रकाशित हुई है।
आईजीएमसी के डॉक्टरों की टीम ने किया बड़ा शोध
आईजीएमसी अस्पताल के बाल रोग विभाग के डॉक्टर हार्दिक महाजन, डॉक्टर राकेश शर्मा और डॉक्टर विपन रोच ने यह रिसर्च किया है। डॉक्टरों की इस टीम ने शिमला जिले के अलग-अलग स्कूलों से छह से 16 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 300 बच्चों को अपने अध्ययन में शामिल किया।
जांच के दौरान डॉक्टरों ने सभी बच्चों के ब्लड प्रेशर की सटीक रीड़िंग ली। पहली बार में जिन बच्चों का ब्लड प्रेशर बढ़ा हुआ मिला, उनकी चार सप्ताह बाद दोबारा जांच की गई। अंतिम मेडिकल रिपोर्ट में 10 प्रतिशत बच्चे प्री-हाइपरटेंशन यानी बीमारी की शुरुआती स्टेज में पाए गए।
मोटापा और बढ़ता वजन बना सबसे बड़ा विलेन
इस मेडिकल रिसर्च का सबसे मुख्य निष्कर्ष बच्चों का बढ़ता हुआ वजन और मोटापा है। डॉक्टरों के अनुसार सर्वे में शामिल बच्चों में से केवल पांच प्रतिशत बच्चे ही ओवरवेट थे। हैरान करने वाली बात यह रही कि स्थायी रूप से बीमार बच्चों में आधे से अधिक इसी वर्ग के थे।
विशेषज्ञों के मुताबिक मोबाइल फोन, वीडियो गेम और टेलीविजन स्क्रीन पर अधिक समय बिताना बच्चों को खेल के मैदानों से दूर कर रहा है। इसके साथ ही जंक फूड और पैकेटबंद चिप्स या कोल्ड ड्रिंक्स का बढ़ता चलन भी बच्चों की सेहत को बहुत नुकसान पहुंचा रहा है।
यही मुख्य कारण है कि पहले केवल वयस्कों में दिखने वाली यह खतरनाक बीमारी अब कम उम्र के बच्चों में भी मिलने लगी है। इसके अलावा जिन बच्चों के माता-पिता या परिवार में पहले से ही हाई बीपी की समस्या थी, उन बच्चों में इसका खतरा बहुत ज्यादा देखा गया।
इस गंभीर संकट से बचने के लिए डॉक्टरों ने सभी स्कूलों में रेगुलर हेल्थ चेकअप कैंप लगाने की सिफारिश की है। स्कूलों में बच्चों के वजन की निगरानी और खेलकूद गतिविधियों को अनिवार्य करना होगा। शुरुआती स्तर पर इसकी पहचान करके बच्चों को भविष्य में होने वाले हार्ट अटैक से बचाया जा सकता है।
Reported By: Asha Thakur

