कोरोना काल के खौफनाक दर्द से उपजी एक अनोखी किताब, जब बंद कमरों की तन्हाई बनी जीने की नई उम्मीद

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Delhi News: कोरोना वायरस महामारी के खौफनाक दौर में जहां चारों तरफ गहरी निराशा पसरी हुई थी, वहीं दिल्ली के एक मशहूर विदेश मामलों के विशेषज्ञ मनीष चंद ने कविता की दुनिया में अपनी मानसिक सांत्वना खोजी। उन्होंने उस मुश्किल समय के भयानक दर्द को शब्दों में पिरोकर एक नई उम्मीद में बदल दिया।

मनीष चंद की नई पुस्तक ‘क्वाट्रेन इन क्वारंटाइन: ड्वेलिंग पोएटिकली ऑन द अर्थ’ इस भावुक यात्रा को बखूबी बयां करती है। शनिवार को जारी एक आधिकारिक बयान के अनुसार, लॉकडाउन और महामारी के चरम पर लिखे गए ये खूबसूरत छंद इंसान की कल्पना और कविता की अद्भुत क्षमता का जश्न मनाते हैं।

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ब्राजील के राजदूत के आवास पर हुआ भव्य पुस्तक विमोचन

इस भयानक महामारी की शुरुआत होने के ठीक छह साल बाद, देश-विदेश के कई जाने-माने कवि, विद्वान, अनुभवी राजनयिक और बुद्धिजीवी इस किताब के विमोचन के लिए एक साथ आए। इस विशेष समारोह का शानदार आयोजन दिल्ली स्थित ब्राजीलियाई राजदूत के आलीशान सरकारी निवास पर किया गया।

भारत में ब्राजील के राजदूत केनेथ नोब्रेगा ने लेखक मनीष चंद की तारीफ करते हुए कहा कि उन्होंने विपरीत परिस्थितियों को कविता में बदल दिया। इस दौरान वहां मौजूद मेहमानों ने कई कविताएं पढ़ीं। उन्होंने इंसानी जीवन से जुड़े प्रेम, अपनों को खोने का दर्द, मृत्यु और पुनर्जन्म जैसे गंभीर विषयों पर विचार साझा किए।

प्रियजनों की मौत की खबरों के बीच लिखी गई कविताएं

लेखक मनीष चंद ने उन डरावने दिनों को याद करते हुए बताया कि जब चारों तरफ से अचानक प्रियजनों के निधन की खबरें आ रही थीं, तब उन्होंने ये कविताएं लिखी थीं। यह कविता संग्रह भाषा और लेखन को एक मजबूत प्रतिरोध के रूप में देखता है, जो मुश्किल वक्त में भी गरिमा से जीना सिखाता है।

इस समारोह में मौजूद राज्यसभा के पूर्व सांसद पवन के वर्मा ने भी महामारी के उन शुरुआती और खौफनाक दिनों की अपनी कुछ धुंधली यादें ताजा कीं। उन्होंने बताया कि किस तरह उस वक्त चारों तरफ सिर्फ डर का माहौल था और लोगों में जीने की उम्मीद पूरी तरह खत्म हो चुकी थी।

क्वारंटाइन सिर्फ एक कैद नहीं बल्कि भीतर जागने की यात्रा है

पूर्व राजनयिक लक्ष्मी पुरी ने इस समारोह के दौरान मनीष चंद की नई किताब के कुछ मुख्य अंश पढ़कर सुनाए। उन्होंने कहा कि क्वारंटाइन में रहना सिर्फ एक शारीरिक कैद नहीं था, बल्कि यह इंसान के भीतर की एक नई जागृति की बेहद भावुक और अंतर्दृष्टिपूर्ण यात्रा थी।

लक्ष्मी पुरी ने आगे कहा कि भले ही इन कविताओं की पृष्ठभूमि कोरोना काल की है, लेकिन ये आम इंसानी हालातों को गहराई से छूती हैं। उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि पूरी किताब में जीवन के प्रति सकारात्मक लचीलापन, बड़ी उम्मीद और मजबूत आशावाद की भावना साफ झलकती है।

Author: Gaurav Malhotra

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