Uttarakhand News: उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने 1994 के ऐतिहासिक रामपुर तिराहा गोलीबारी कांड को लेकर अहम निर्देश दिए हैं। सोमवार को अदालत ने याचिकाकर्ता को आरोपियों पर मुकदमा चलाने से जुड़े कानूनी तर्कों का आधार बताते हुए लिखित जवाब दाखिल करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई आगामी 29 जुलाई को होगी।
अदालत ने पूछा मामला उत्तराखंड का या इलाहाबाद का
न्यायमूर्ति आलोक माहरा की एकलपीठ ने इस संवेदनशील मामले की सुनवाई की। अदालत ने इस दौरान सबसे बड़ा सवाल कानूनी अधिकार क्षेत्र (ज्यूरिस्डिक्शन) पर उठाया। कोर्ट ने पूछा कि इस मामले की सुनवाई उत्तराखंड उच्च न्यायालय में होनी चाहिए या फिर उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद उच्च न्यायालय में की जानी चाहिए।
अदालत ने कानूनी पेंच को स्पष्ट करते हुए कहा कि जब यह ऐतिहासिक घटना घटी थी, उस समय उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश एक ही राज्य का हिस्सा हुआ करते थे। दोनों राज्य बाद में अलग हुए हैं। इसलिए इस मामले में कानूनी क्षेत्राधिकार को पूरी तरह स्पष्ट करना बेहद जरूरी है।
देहरादून से मुजफ्फरनगर केस ट्रांसफर करने को चुनौती
मूल मामले के अनुसार, उत्तराखंड आंदोलनकारी ‘एडवोकेट फोरम’ के अध्यक्ष रमन साह ने यह विशेष याचिका दायर की है। उन्होंने देहरादून के जिला एवं विशेष सीबीआई न्यायाधीश के उस प्रशासनिक आदेश को चुनौती दी है, जिसके तहत इस मुजफ्फरनगर (रामपुर तिराहा) मामले को मुजफ्फरनगर की अदालत में स्थानांतरित किया गया है।
याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि पृथक उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान दो अक्टूबर 1994 को दिल्ली जा रहे प्रदर्शनकारियों के साथ मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा पर पुलिस ने बर्बर व्यवहार किया था। इस घटना में कई निहत्थे आंदोलनकारियों की जान चली गई थी और महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार हुआ था।
सीबीआई ने गैर-इरादतन हत्या की धारा में दिया था आरोपपत्र
केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने गहरी जांच के बाद आरोपियों के खिलाफ देहरादून की अदालत में भारतीय दंड संहिता की धारा 304 (गैर-इरादतन हत्या) के तहत आरोपपत्र दाखिल किया था। हालांकि, विशेष अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए धारा 302 (हत्या) के तहत संज्ञान लिया था।
याचिकाकर्ता रमन साह ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने पहले कानूनी राहत के लिए देश की सर्वोच्च अदालत (उच्चतम न्यायालय) का रुख किया था। हालांकि, उच्चतम न्यायालय ने उन्हें संबंधित उच्च न्यायालय जाने की अनुमति दी थी, जिसके बाद उन्होंने उत्तराखंड उच्च न्यायालय में यह रिट याचिका दायर की है।

