Jharkhand News: सिविल सर्जन कार्यालय के डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम सभागार में शनिवार को “इनपेशेंट ग्लाइसेमिक कंट्रोल” विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस विशेष कार्यशाला की अध्यक्षता मुख्य चिकित्सा अधिकारी सह सिविल सर्जन डॉ. साहिर पाल ने की।
इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में अस्पतालों में भर्ती गंभीर मरीजों के ब्लड शुगर नियंत्रण, उपचार की उच्च गुणवत्ता और मधुमेह प्रबंधन के विभिन्न तकनीकी पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की गई। डॉक्टरों ने मरीजों की सुरक्षा को लेकर कई बड़े सुझाव दिए।
सिविल सर्जन डॉ. साहिर पाल ने अपने संबोधन में कहा कि इनपेशेंट ग्लाइसेमिक कंट्रोल अस्पताल में भर्ती मरीजों के रक्त शर्करा स्तर को सुरक्षित बनाए रखने की प्रक्रिया है। इसके जरिए मरीजों के स्वास्थ्य में बहुत तेजी से सुधार देखने को मिलता है।
उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य सेवाओं का मुख्य उद्देश्य केवल मरीजों का औपचारिक उपचार करना नहीं है। डॉक्टरों को आम लोगों में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था के प्रति अटूट विश्वास और सहज पहुंच भी सुनिश्चित करनी होगी, जो आज के समय में बेहद जरूरी है।
डॉ. साहिर पाल ने अस्पताल में उपलब्ध सभी आधुनिक चिकित्सा संसाधनों का बेहतर उपयोग करने की सलाह दी। उन्होंने सभी स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक पारदर्शी, उत्तरदायी और पूरी तरह से जनोन्मुख बनाने पर विशेष बल दिया ताकि गरीबों को लाभ मिले।
डायबिटोलॉजिस्ट डॉ. राम कुमार ने दी इंसुलिन की अहम जानकारी
कार्यशाला में मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित सदर अस्पताल के विख्यात डायबिटोलॉजिस्ट डॉ. राम कुमार ने कई महत्वपूर्ण बातें साझा कीं। उन्होंने बताया कि ग्लाइसेमिक नियंत्रण का प्रमुख उद्देश्य संक्रमण की रोकथाम और अंदरूनी अंगों की सुरक्षा करना है।
उन्होंने डॉक्टरों को संबोधित करते हुए कहा कि रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित रखने से हाइपोग्लाइसीमिया के बड़े जोखिम को कम किया जा सकता है। उचित समय पर सही इलाज मिलने से गंभीर मरीजों की रिकवरी काफी बेहतर होती है।
डॉ. राम कुमार ने संतुलित आहार, नियमित पानी पीने, ताजे फल, हरी सब्जियां, साबुत अनाज और दालें खाने की सलाह दी। इसके साथ ही उन्होंने कम वसा वाले प्रोटीन युक्त भोजन को मधुमेह नियंत्रण के लिए बेहद जरूरी बताया।
उन्होंने बेसल-बोलस इंसुलिन रेजिमन की विस्तृत तकनीकी जानकारी दी। उन्होंने कहा कि गैर-गंभीर मरीजों के लिए यह आधुनिक चिकित्सा पद्धति काफी प्रभावी मानी जाती है। डॉक्टरों को केवल पारंपरिक स्लाइडिंग स्केल इंसुलिन पर निर्भर रहने से बचना चाहिए।
उन्होंने डॉक्टरों को बताया कि इंसुलिन लेने वाले मरीजों को प्रतिदिन कम से कम तीन बार ब्लड ग्लूकोज की नियमित जांच करनी चाहिए। इसके साथ ही मरीजों को अपनी एचबीए1सी की जांच हर तीन महीने में अनिवार्य रूप से करानी चाहिए।
कार्यक्रम के अंत में जिला आरसीएच पदाधिकारी डॉ. रंजीत कुमार पांडा ने सभी आगंतुकों का धन्यवाद ज्ञापन किया। इस कार्यशाला में विभिन्न विभागों के वरिष्ठ चिकित्सक, विशेषज्ञ, एएनएम, अस्पताल प्रबंधक एवं सैकड़ों पैरामेडिकल स्वास्थ्यकर्मी मुख्य रूप से उपस्थित थे।
Author: Rohit Mahato

