Business News: हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में जारी भयंकर नाकेबंदी के बीच वैश्विक तेल संकट लगातार गहराता जा रहा है। इसी दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक बड़े फैसले ने भारत की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। अमेरिका ने भारत को रूसी तेल खरीदने के लिए दी गई विशेष छूट को आगे बढ़ाने से साफ इनकार कर दिया है।
अमेरिका का यह कड़ा फैसला भारतीय ऊर्जा क्षेत्र के लिए एक बहुत बड़ा झटका माना जा रहा है। प्रतिबंधों में मिली यह बड़ी छूट रविवार को पूरी तरह समाप्त हो गई है। इसके चलते अब भारतीय रिफाइनिंग कंपनियों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापार करने के जोखिम का समीकरण रातों-रात बदल गया है।
मौजूदा समय में हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य से कच्चे तेल के टैंकरों की आवाजाही बेहद धीमी हो चुकी है। इसके साथ ही समुद्री जहाजों के लिए बीमा की लागत भी आसमान छू रही है। मिडिल ईस्ट में युद्ध शुरू होने से पहले कच्चा तेल 72 डॉलर प्रति बैरल था, जो अब 105 डॉलर के पार है।
भारत के सामने खड़ी हुई दोहरी मुसीबत
भारतीय रिफाइनरी कंपनियां अब वैश्विक बाजार में दोहरी मार का सामना कर रही हैं। एक तरफ जहां मध्य-पूर्व से होने वाली तेल की आपूर्ति पहले से ही काफी अस्थिर बनी हुई है। वहीं दूसरी तरफ, सबसे सस्ते रूसी तेल की निर्बाध आपूर्ति पर भी दोबारा प्रतिबंधों का बड़ा खतरा मंडराने लगा है।
यह गंभीर स्थिति ठीक ऐसे समय पर पैदा हुई है जब हाल ही में भारत के पांच राज्यों में घरेलू ईंधन की कीमतों में तीन रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई है। इस नए संकट के बाद अब बाजार में यह बड़ा सवाल उठने लगा है कि क्या देश में पेट्रोल-डीजल और महंगे होंगे।
रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से रूस भारत के लिए कच्चे तेल का सबसे बड़ा मददगार और आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा था। भारत अपनी जरूरत का 85 फीसदी से ज्यादा तेल आयात करता है। केपलर के आंकड़ों के मुताबिक भारत मई में रूस से रिकॉर्ड 23 लाख बैरल प्रतिदिन तेल खरीद रहा था।
महंगाई बढ़ने का खतरा और भारत के पास विकल्प
अगर अमेरिकी प्रतिबंधों के डर से भारतीय रिफाइनरियों ने रूस से कच्चा तेल खरीदना कम किया, तो उन्हें मिडिल ईस्ट का रुख करना पड़ेगा। उस क्षेत्र में पहले से ही तनाव के कारण कीमतें बहुत ज्यादा हैं। इससे भारत का तेल आयात बिल बढ़ेगा और देश में महंगाई का बोझ सीधा आम उपभोक्ताओं पर आएगा।
इस संकट से निपटने के लिए भारत सरकार के पास अब बहुत ही सीमित और कड़े विकल्प बचे हैं। सरकार टैक्स में कटौती या भारी सब्सिडी के जरिए घरेलू बाजार पर पड़ रहे इस आर्थिक दबाव को कुछ समय के लिए खुद झेल सकती है, लेकिन इसकी देश को बड़ी आर्थिक कीमत चुकानी होगी।
इसके अलावा सरकार अपनी तेल कंपनियों को कुछ समय के लिए घाटा उठाने को कह सकती है, जिससे कंपनियों की बैलेंस शीट बिगड़ जाएगी। आखिरी विकल्प के रूप में सरकार खुदरा ईंधन की कीमतों को दोबारा बढ़ने दे सकती है। अगर संकट लंबा चला, तो देश में ईंधन बचत के पुराने कड़े नियम भी लौट सकते हैं।
Author: Rajesh Kumar

