International News: सऊदी अरब में हज 2026 की शुरुआत के साथ एक बार फिर दुनिया भर के मुसलमानों का ध्यान मक्का की ओर है। आज हवाई जहाज से कुछ घंटों में पूरी होने वाली यह यात्रा मुगल काल में महीनों तक चलती थी। उस दौर में हज केवल धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि धैर्य, साहस और आर्थिक क्षमता की बड़ी परीक्षा माना जाता था।
इस्लाम के पांच प्रमुख स्तंभों में शामिल हज का महत्व सदियों से कायम है। मुगल शासन के दौरान भी हजारों भारतीय मुसलमान मक्का पहुंचने का सपना देखते थे। हालांकि उस समय आधुनिक परिवहन साधन नहीं थे। इसलिए हज पर निकलना जीवन के सबसे कठिन और जोखिम भरे निर्णयों में गिना जाता था।
सूरत था हज यात्रियों का सबसे बड़ा केंद्र
मुगल काल में भारत से मक्का जाने का सबसे प्रमुख मार्ग समुद्री रास्ता था। उत्तर भारत, गुजरात और दक्कन से आने वाले यात्री पहले सूरत पहुंचते थे। यह बंदरगाह उस समय अरब देशों के लिए समुद्री संपर्क का मुख्य केंद्र था। यहां से हज यात्रियों और व्यापारियों के जहाज नियमित रूप से रवाना होते थे।
यात्री अपने शहरों से बड़े काफिलों में निकलते थे। कई बार सूरत तक पहुंचने में ही एक या दो महीने लग जाते थे। बंदरगाह पहुंचने के बाद उन्हें जहाज और अनुकूल मौसम का इंतजार करना पड़ता था। इसके बाद समुद्री यात्रा शुरू होती थी, जो पूरी तरह प्राकृतिक परिस्थितियों पर निर्भर रहती थी।
समुद्र पार कर ऐसे पहुंचते थे मक्का
सूरत से निकलने वाले जहाज अरब सागर पार करके जेद्दा या मोखा जैसे बंदरगाहों तक पहुंचते थे। वहां से यात्री ऊंटों, घोड़ों या पैदल मक्का की ओर बढ़ते थे। समुद्री और स्थलीय यात्रा का यह संयुक्त सफर लंबा और बेहद थकाने वाला माना जाता था।
दिल्ली, आगरा या लाहौर जैसे शहरों से निकलने वाले लोगों को पूरी यात्रा पूरी करने और वापस लौटने में छह महीने से लेकर एक साल तक लग सकता था। मौसम खराब होने या जहाजों में देरी होने पर यह अवधि और भी बढ़ जाती थी।
तूफान, बीमारी और लुटेरों का बड़ा खतरा
उस समय जहाज लकड़ी के बने होते थे और उनकी गति हवा पर निर्भर रहती थी। अरब सागर में आने वाले तूफान कई बार जहाजों को गंभीर नुकसान पहुंचाते थे। ऊंची लहरें, सीमित भोजन और साफ पानी की कमी यात्रियों के लिए बड़ी चुनौती बन जाती थी।
यात्रा के दौरान समुद्री बीमारी भी आम समस्या थी। गर्म मौसम और भीड़भाड़ के कारण संक्रमण फैलने का खतरा बना रहता था। कई यात्री सफर के दौरान बीमार पड़ जाते थे, जबकि कुछ लोग अपने घर वापस लौट ही नहीं पाते थे।
पुर्तगालियों ने भी बढ़ाई थीं मुश्किलें
16वीं और 17वीं सदी में हिंद महासागर के कई समुद्री मार्गों पर पुर्तगालियों का प्रभाव था। वे कई जहाजों से ‘कार्ताज़’ नामक अनुमति पत्र मांगते थे। बिना अनुमति वाले जहाजों को रोका या कब्जे में लिया जा सकता था, जिससे हज यात्रियों की परेशानियां और बढ़ जाती थीं।
जहांगीर के शासनकाल में शाही जहाज ‘रहीमी’ को पुर्तगालियों द्वारा पकड़ लिया गया था। इस घटना ने मुगल दरबार और पुर्तगाली ताकतों के बीच तनाव बढ़ा दिया था। इससे स्पष्ट होता है कि हज यात्रा धार्मिक होने के साथ राजनीतिक चुनौतियों से भी जुड़ी हुई थी।
हज यात्रा हर किसी के लिए आसान नहीं थी
मुगल काल में हज पर जाना काफी महंगा माना जाता था। यात्रियों को घर से बंदरगाह तक पहुंचने, जहाज का किराया, भोजन, ठहरने और वापसी तक का पूरा खर्च स्वयं उठाना पड़ता था। कई परिवार वर्षों तक बचत करने के बाद ही इस पवित्र यात्रा पर निकल पाते थे।
हज यात्रा के लिए निकलने वाला व्यक्ति अक्सर अपने परिवार से लंबे समय के लिए दूर हो जाता था। उस दौर में संचार के साधन नहीं थे। इसलिए घरवालों को महीनों तक कोई जानकारी नहीं मिलती थी और सुरक्षित वापसी की खबर का बेसब्री से इंतजार किया जाता था।
शाही महिलाओं ने भी किया था हज
मुगल इतिहास में बाबर की बेटी और हुमायूं की बहन गुलबदन बेगम की हज यात्रा विशेष रूप से उल्लेखनीय मानी जाती है। अकबर के शासनकाल में उन्होंने अन्य शाही महिलाओं के साथ मक्का की यात्रा की थी। इससे पता चलता है कि शाही परिवार में भी हज के प्रति गहरी आस्था मौजूद थी।
हालांकि शाही महिलाओं के लिए भी यह यात्रा आसान नहीं थी। उनके साथ बड़े काफिले, सुरक्षा व्यवस्था और पर्याप्त संसाधनों की जरूरत पड़ती थी। अकबर ने भी हज यात्रियों की सहायता और सुविधा के लिए कई प्रशासनिक व्यवस्थाएं लागू की थीं।
बादशाह नहीं गए, लेकिन मदद जरूर की
इतिहासकारों के अनुसार कोई प्रमुख मुगल बादशाह स्वयं हज के लिए मक्का नहीं पहुंच सका। शासन की जिम्मेदारियां, लंबी दूरी और यात्रा के जोखिम इसकी मुख्य वजह थे। इसके बावजूद मुगल शासकों ने मक्का और मदीना के लिए दान, उपहार और आर्थिक सहायता भेजना जारी रखा।
मुगल शासन में हज को विशेष सम्मान प्राप्त था। यात्रियों की सुरक्षा और सुविधाओं को लेकर भी दरबार सजग रहता था। यही कारण है कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद बड़ी संख्या में भारतीय मुसलमान हर वर्ष इस ऐतिहासिक और आध्यात्मिक यात्रा पर निकलते रहे।
Author: Pallavi Sharma

