Delhi News: मां बनना हर महिला के जीवन का सबसे खूबसूरत और सुखद अहसास होता है। हालांकि, गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को कई तरह के शारीरिक और मानसिक बदलावों से गुजरना पड़ता है। इस संवेदनशील समय में कई महिलाओं को थायराइड की गंभीर समस्या का सामना करना पड़ता है।
गर्भावस्था के दौरान थायराइड का स्तर अनियंत्रित होना बेहद चिंताजनक हो सकता है। इसका सीधा असर गर्भ में पल रहे शिशु के मानसिक और शारीरिक विकास पर पड़ता है। इसलिए, डॉक्टरों के अनुसार पूरी प्रेग्नेंसी के दौरान थायराइड के स्तर को सामान्य बनाए रखना बेहद जरूरी होता है।
हाइपो और हाइपरथायरायडिज्म के मुख्य लक्षण
थायराइड मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है, जिनके लक्षण पूरी तरह अलग होते हैं। हाइपोथायरायडिज्म में शरीर के भीतर थायराइड हार्मोन का निर्माण बहुत कम होने लगता है। इसकी वजह से गर्भवती महिला को अत्यधिक थकान, कब्ज, चेहरे पर भारी सूजन, अचानक वजन बढ़ना और शरीर में तेज दर्द महसूस होता है।
इसके विपरीत, हाइपरथायरायडिज्म की स्थिति में थायराइड हार्मोन जरूरत से ज्यादा बनने लगता है। इसके कारण महिला को अत्यधिक पसीना आता है, वजन तेजी से घटने लगता है, पेट खराब रहता है और बार-बार चक्कर आते हैं। इसके साथ ही भूख के पैटर्न में भी बड़ा बदलाव देखने को मिलता है।
जानें प्रेग्नेंसी की तीनों तिमाहियों में क्या है सामान्य स्तर
आमतौर पर गर्भावस्था के दौरान थायराइड का सामान्य स्तर 0.4 से 4 mIU/L के बीच सुरक्षित माना जाता है। पहली तिमाही में इसका स्तर 0.1 से 2.5 mIU/L होना चाहिए। दूसरी तिमाही में 0.2 से 3.0 mIU/L और तीसरी तिमाही में यह 0.3 से 3.0 mIU/L के बीच रहना सेहत के लिए बेहतर है।
यदि गर्भावस्था में इनमें से कोई भी लक्षण दिखाई दे, तो डॉक्टर तुरंत टीएसएच (TSH) ब्लड टेस्ट कराने की सलाह देते हैं। इस महत्वपूर्ण टेस्ट की रिपोर्ट के आधार पर ही डॉक्टर सुरक्षित दवाएं निर्धारित करते हैं। ये दवाएं मां और होने वाले बच्चे दोनों की सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी होती हैं।
थायराइड को नियंत्रित रखने के लिए डॉक्टर की बताई दवाओं का नियमित सेवन करें। अपनी डाइट से अत्यधिक मीठा, रिफाइंड तेल, चाय और कॉफी की मात्रा को तुरंत कम कर दें। मानसिक तनाव से पूरी तरह दूर रहें और शरीर को एक्टिव रखने के लिए नियमित रूप से हल्का व्यायाम और योग करें।
Author: Asha Thakur


