Himachal News: मध्य प्रदेश के बाद अब हिमाचल प्रदेश में भी किसानों का गुस्सा फूट पड़ा है। मंडी जिले में एक नाराज पशुपालक ने 1200 लीटर दूध सड़क पर बहा दिया। यह घटना तब हुई जब मिल्कफेड प्लांट ने दूध लेने से साफ इनकार कर दिया। इस घटना ने राज्य की सुक्खू सरकार की व्यवस्था परिवर्तन की नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सड़कों पर दूध बहने का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।
चक्कर मिल्क प्लांट में किसानों का हंगामा
मंडी जिले के चक्कर स्थित मिल्कफेड प्लांट में यह पूरा विवाद शुरू हुआ। शनिवार और रविवार को प्लांट के कर्मचारियों ने पशुपालकों का दूध लेने से मना कर दिया। लगातार दो दिन तक दूध वापस होने से किसान भड़क गए। बल्ह क्षेत्र के एक पशुपालक ने गुस्से में अपनी गाड़ी से 1200 लीटर दूध निकाला और उसे प्लांट के मेन गेट के बाहर ही उड़ेल दिया। इस पूरी घटना का वीडियो अब इंटरनेट पर चर्चा का विषय बना हुआ है।
वायरल वीडियो में किसान राज्य सरकार की नीतियों की कड़ी आलोचना करते हुए दिखाई दे रहे हैं। पशुपालकों का सीधा आरोप है कि चक्कर मिल्क प्लांट में हर महीने चार दिन ऐसे ही मनमाने कट लगाए जाते हैं। इन दिनों में किसानों से बिल्कुल दूध नहीं खरीदा जाता है। दूध खराब होने के डर और आर्थिक नुकसान की वजह से किसानों में भारी आक्रोश पनप रहा है। वे इसे अपने रोजगार और जीवन यापन पर सीधा हमला मान रहे हैं।
कर्ज में डूबे किसानों की दर्दभरी कहानी
दूध बहाने वाले पशुपालक रवि सैनी ने अपनी आर्थिक परेशानी को विस्तार से साझा किया। उन्होंने बताया कि इस मनमानी के कारण उन्हें एक ही दिन में करीब पचास हजार रुपये का भारी नुकसान झेलना पड़ा है। रवि पिछले चार सालों से डेयरी फार्मिंग के व्यवसाय से जुड़े हुए हैं। उनके पास इस समय कुल तीस गायें मौजूद हैं। उन्होंने अपना यह स्वरोजगार शुरू करने के लिए एक बैंक से करीब एक करोड़ रुपये का बड़ा कर्ज ले रखा है।
रवि सैनी ने गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि उन्हें हर महीने बैंक में लाखों रुपये की भारी किस्त जमा करनी पड़ती है। अगर मिल्क प्लांट इसी तरह अपनी मनमर्जी से दूध लेने पर रोक लगाता रहा, तो वे बैंक का कर्ज कभी नहीं चुका पाएंगे। उनका पूरा परिवार इसी व्यवसाय पर पूरी तरह से निर्भर करता है। पशुओं के महंगे चारे और रखरखाव का खर्च भी बहुत अधिक है। ऐसे में किसानों के सामने भूखों मरने की नौबत आ सकती है।
मिल्कफेड प्रबंधन का क्या है तर्क?
इस पूरे विवाद पर चक्कर मिल्कफेड प्लांट के प्रभारी विश्वकांत शर्मा ने भी अपना पक्ष मजबूती से रखा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस प्लांट की दूध भंडारण क्षमता केवल एक लाख लीटर तक ही सीमित है। इस निर्धारित क्षमता से अधिक दूध को प्लांट के अंदर सुरक्षित स्टोर करके रखना तकनीकी रूप से असंभव है। इसी मजबूरी और स्टोरेज की कमी को देखते हुए फिलहाल पशुपालकों से एरिया वाइज तय समय पर ही दूध लिया जा रहा है।
विश्वकांत शर्मा ने यह भी दावा किया कि दूध न लेने के इस कड़े फैसले के बारे में किसानों को कुछ दिन पहले ही उचित दिशा निर्देश दे दिए गए थे। उन्होंने मेन गेट पर दूध बहाने वाले संबंधित पशुपालक की इस हिंसक हरकत की कड़ी निंदा की है। शर्मा ने आज साफ तौर पर कहा है कि सरकारी संपत्ति के पास इस तरह का भारी उपद्रव करने पर वे उस पशुपालक के खिलाफ पुलिस में भी आधिकारिक शिकायत दर्ज करवाएंगे।
सुक्खू सरकार की नीतियों पर उठते गंभीर सवाल
हिमाचल प्रदेश में वर्तमान सुक्खू सरकार अक्सर मंचों से किसानों और पशुपालकों की सबसे बड़ी हितैषी होने के बड़े दावे करती रहती है। सरकार ने सत्ता में आते ही राज्य में बड़े व्यवस्था परिवर्तन का नारा भी जोर शोर से दिया था। लेकिन मंडी जिले में सामने आई यह जमीनी हकीकत इन सभी सरकारी दावों की बिल्कुल अलग कहानी बयां कर रही है। किसानों का मेहनत से निकाला गया दूध आज प्लांट की जगह सड़क और नालियों में बह रहा है।
यह कोई पहला मौका नहीं है जब प्रदेश में दुग्ध उत्पादकों को मौजूदा सरकार के कार्यकाल में भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा हो। कुछ महीने पहले भी यही किसान दूध का समय पर भुगतान न होने के कारण प्रदेश सरकार से नाराज चल रहे थे। दूध की खरीद में इस तरह के कट लगने से उनकी समस्याएं अब और अधिक विकराल रूप लेती नजर आ रही हैं। किसानों का धैर्य अब धीरे धीरे पूरी तरह से जवाब दे रहा है।
पिछले महीने ही पशुपालकों ने अपनी इन्हीं मांगों को लेकर रामपुर में एक बड़ा विरोध प्रदर्शन भी किया था। मध्य प्रदेश में भी हाल ही में किसानों ने हजारों लीटर दूध नदी में बहाकर अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया था। अब हिमाचल में भी बिल्कुल वैसी ही तस्वीरें सामने आना सरकार के लिए एक बड़े खतरे की घंटी है। अगर जल्द ही प्लांट की क्षमता नहीं बढ़ाई गई, तो यह नया किसान आंदोलन पूरे राज्य में बहुत तेजी से फैल सकता है।


