केरल में कांग्रेस की ‘जीत’ के बाद महासंग्राम: मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए दिल्ली में लॉबिंग तेज, राहुल गांधी की बढ़ी टेंशन

Kerala News: केरल विधानसभा चुनाव में ढाई साल के लंबे इंतजार के बाद कांग्रेस नीत यूडीएफ (UDF) ने शानदार वापसी की है। इस बड़ी जीत ने पार्टी कार्यकर्ताओं में नया जोश भर दिया है। हालांकि, जीत की खुशी के साथ ही अब मुख्यमंत्री पद को लेकर घमासान शुरू हो गया है। दिल्ली दरबार में मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए जोरदार पैरवी चल रही है। कांग्रेस के पर्यवेक्षकों ने विधायकों से रायशुमारी पूरी कर ली है। अब अंतिम फैसला कांग्रेस आलाकमान मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी को लेना है।

वेणुगोपाल रेस में सबसे आगे, सतीशन और चेन्नीथला भी कतार में

विधायकों की रायशुमारी में के सी वेणुगोपाल का नाम सबसे ऊपर उभरकर सामने आया है। गांधी परिवार के बेहद करीबी और संगठन पर मजबूत पकड़ रखने वाले वेणुगोपाल को अधिकांश विधायकों का समर्थन मिला है। उनके बाद रमेश चेन्नीथला और वीडी सतीशन का नाम भी चर्चा में बना हुआ है। हालांकि, कांग्रेस की परंपरा के अनुसार केवल संख्याबल ही मुख्यमंत्री तय नहीं करता। जातीय समीकरण और हाईकमान का भरोसा भी इस फैसले में बड़ी भूमिका निभाएगा।

राहुल गांधी के सामने गुटबाजी रोकने की बड़ी चुनौती

कांग्रेस के लिए यह जीत जितनी सुखद है, उतनी ही चुनौतीपूर्ण भी साबित हो रही है। लंबे समय बाद मिली सत्ता अक्सर पार्टी के भीतर गुटबाजी को हवा दे देती है। राहुल गांधी के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि कहीं मुख्यमंत्री के चयन से पार्टी में फूट न पड़ जाए। कांग्रेस पूर्व में राजस्थान, पंजाब और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में अंदरूनी कलह का खामियाजा भुगत चुकी है। इसलिए नेतृत्व इस बार बहुत सावधानी से कदम उठा रहा है।

सहयोगी दल IUML का दबाव और डिप्टी सीएम की मांग

सरकार गठन की प्रक्रिया के बीच सहयोगी दलों ने भी अपनी शर्तें रख दी हैं। इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) ने उपमुख्यमंत्री पद के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया है। पार्टी चाहती है कि पी के कुनजलीकुट्टी को डिप्टी सीएम बनाया जाए। यूडीएफ की इस जीत में मुस्लिम लीग की भूमिका निर्णायक रही है। ऐसे में कांग्रेस नेतृत्व अपने इस मजबूत साथी को नाराज करने का जोखिम नहीं लेना चाहता। यह मांग सत्ता के समीकरण को और पेचीदा बना रही है।

तेलंगाना और कर्नाटक जैसा मॉडल अपनाएगा आलाकमान?

कांग्रेस आलाकमान केरल में भी तेलंगाना और कर्नाटक जैसा सफल मॉडल दोहराना चाहता है। हिमाचल प्रदेश और अन्य राज्यों की जीत के बाद कांग्रेस के पास अब केवल चार राज्यों में अपनी सरकार है। पार्टी जानती है कि अगर शुरुआती चरण में ही मतभेद खुलकर सामने आए, तो विपक्ष को हमला करने का मौका मिल जाएगा। अब चुनौती सिर्फ मुख्यमंत्री चुनने की नहीं, बल्कि इस महत्वपूर्ण जीत को अगले पांच सालों तक सुरक्षित रखने की भी है।

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