ममता बनर्जी के बाद क्या अब उद्धव ठाकरे की बारी? शिवसेना के इन सांसदों के पाला बदलने की बड़ी खबर

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Maharashtra News: पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी में मची भारी टूट के बाद अब महाराष्ट्र की सियासत गरमा गई है। यहाँ उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) पर भी बड़ा खतरा मंडराने लगा है। खबर है कि पार्टी के 9 में से 6 लोकसभा सांसद एकनाथ शिंदे गुट का समर्थन कर सकते हैं।

शिवसेना मुखपत्र सामना में फूटा बगावत पर गुस्सा

इस बड़े सियासी संकट को लेकर शिवसेना (यूबीटी) के मुखपत्र ‘सामना’ में एक तीखा लेख प्रकाशित किया गया है। संपादकीय लेख में दल-बदल करने वाले नेताओं की कड़ी आलोचना की गई है। उद्धव गुट ने बुधवार को कहा कि वर्तमान राजनीति पूरी तरह से अनिश्चित हो गई है। यहाँ कब किसकी किस्मत चमक जाए, कुछ नहीं कहा जा सकता।

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पार्टी ने बंगाल के ताजा हालात का हवाला देते हुए कहा कि मौजूदा राजनीतिक स्थिति अब बेहद बेतुके स्तर पर पहुंच गई है। लेख के अनुसार, ‘नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ (एनसीपीआई) नामक एक बेहद छोटे और अनजान संगठन की अचानक बड़ी लॉटरी लग गई है। इस अनजान दल को अचानक 22 बने-बनाए सांसद मिल गए हैं।

बड़े-बड़े दिग्गज फेल लेकिन एक छोटे दल की लगी लॉटरी

संपादकीय में तंज कसते हुए कहा गया कि शिवसेना या शरद पवार की एनसीपी जैसी मजबूत क्षेत्रीय पार्टियां भी कभी एक बार में इतने सांसद नहीं जुटा पाईं। कई राजनीतिक दल तो जीवनभर एक विधायक या सांसद जिताने के लिए संघर्ष करते हैं। जो काम अरविंद केजरीवाल और प्रकाश अंबेडकर नहीं कर पाए, वह त्रिपुरा की इस पार्टी ने कर दिखाया।

उद्धव गुट के अनुसार, भारतीय लोकतंत्र का यह अनोखा चमत्कार पूरी तरह से केंद्र सरकार की रणनीतिक चालों के कारण ही संभव हो पाया है। त्रिपुरा जैसे छोटे राज्य की यह पार्टी, जहाँ सिर्फ दो लोकसभा सीटें हैं, अब संसद में 22 सीटों पर काबिज होने जा रही है। यह सीधे तौर पर पीएम मोदी का समर्थन करेगी।

पार्टी प्रमुख उत्तिया कुंडू खुद रह गए पूरी तरह हैरान

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे मजेदार बात यह रही कि एनसीपीआई के मुख्य नेता उत्तिया कुंडू को इस बात की भनक तक नहीं थी। उनकी पार्टी में अचानक 22 सांसदों की एंट्री हो गई। इस अप्रत्याशित घटनाक्रम से वे खुद हैरान और उलझन में पड़ गए। सांसदों के इस सामूहिक दलबदल को मनी लॉन्ड्रिंग जैसा बताया गया है।

ठाकरे गुट ने स्पष्ट दावा किया है कि टीएमसी के डरपोक और स्वार्थी सांसदों ने अपनी सुरक्षा के लिए इस छोटी पार्टी में विलय की बड़ी साजिश रची है। यह भारतीय राजनीति के इतिहास में एक बेहद काला अध्याय है। बीजेपी ने चुनाव के बाद टीएमसी का नाम मिटाने का जो वादा किया था, वह सच होता दिख रहा है।

पार्टी बदलने वालों और गद्दारों की बाजार में भारी कीमत

संपादकीय में ममता बनर्जी की पार्टी के बागियों पर निशाना साधते हुए कहा गया कि उनकी ‘मां, माटी, मानुष’ की बंगाली पहचान की बातें खोखली थीं। उन्हें बंगाल के गौरव से कोई सच्चा लगाव नहीं था। हार की आहट पाते ही वे सूखे पत्तों की तरह बिखर गए। यह राजनीतिक खेल अब सिर्फ बंगाल तक सीमित नहीं है।

ठाकरे गुट ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि दिल्ली में बैठी सत्ताधारी पार्टी ने दूसरे स्वाभिमानी राज्यों में भी ठीक यही खतरनाक रणनीति अपनाई है। महाराष्ट्र में भी इसी तरह का खेल दोबारा खेलने की कोशिश हो रही है। फिलहाल राजनीतिक बाजार में अपनी निष्ठा बदलने वाले गद्दार नेताओं की ही सबसे ज्यादा कीमत लगाई जा रही है।

Author: Harikarishan Sharma

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