Business News: देश में गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स यानी जीएसटी लागू हुए जल्द ही नौ साल पूरे होने वाले हैं। केंद्र सरकार समय-समय पर इस टैक्स व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए कई बड़े बदलाव करती रही है। इन दिनों बाजार में ई-वे बिल को लेकर एक नई चर्चा तेजी से शुरू हो गई है।
ज्यादातर छोटे व्यापारियों को अभी भी इस डिजिटल व्यवस्था के बारे में बहुत कम जानकारी है। बता दें कि इलेक्ट्रॉनिक वे बिल एक महत्वपूर्ण डिजिटल दस्तावेज है। इसे किसी भी माल की ढुलाई के लिए जीएसटी प्रणाली के तहत ऑनलाइन जनरेट किया जाता है। यह टैक्स नियमों के पालन को दर्शाता है।
जानिए क्या होता है ई-वे बिल और यह किसके लिए है जरूरी
जीएसटी नियमों के अनुसार पचास हजार रुपये से अधिक कीमत के माल के परिवहन के लिए ई-वे बिल बनाना बेहद जरूरी होता है। इसे माल भेजने वाला सप्लायर, माल प्राप्त करने वाला खरीदार या कोई भी रजिस्टर्ड ट्रांसपोर्टर अपने स्तर पर आसानी से ऑनलाइन पोर्टल के जरिए जनरेट कर सकता है।
जो ट्रांसपोर्टर जीएसटी के तहत रजिस्टर्ड नहीं हैं, वे भी साझा पोर्टल पर आसानी से अपना नया एनरोलमेंट करा सकते हैं। इसके बाद वे अपने ग्राहकों के माल परिवहन हेतु ई-वे बिल बना सकते हैं। यदि माल का मूल्य पचास हजार से अधिक है, तो यह ट्रांसपोर्टर की कानूनी जिम्मेदारी बनती है।
डिजिटल दस्तावेज के दो हिस्सों में दर्ज होती है पूरी जानकारी
इस महत्वपूर्ण डिजिटल दस्तावेज के मुख्य रूप से दो भाग होते हैं। इसके पार्ट ए में माल भेजने वाले सप्लायर का जीएसटी नंबर, खरीदार का जीएसटी नंबर, चालान नंबर, माल की कुल कीमत, एचएसएन कोड और माल की डिलीवरी वाले अंतिम स्थान की सटीक जानकारी लिखी होती है।
इसके साथ ही दस्तावेज के पार्ट बी में माल ले जाने वाले ट्रांसपोर्टर की आईडी और माल ढोने वाले वाहन का नंबर दर्ज होता है। ई-वे बिल का मुख्य उद्देश्य माल ढुलाई की वास्तविक निगरानी करना है। इस पारदर्शी ऑनलाइन व्यवस्था से टैक्स की चोरी पर पूरी तरह रोक लगती है।
जीएसटी पोर्टल पर इन दो बड़े बदलावों की थी तैयारी
इस व्यवस्था से खरीदार और ट्रांसपोर्टर अपने कीमती माल और वाहन को लाइव ट्रैक कर सकते हैं। इससे सरकारी चेकपोस्ट पर जांच का समय बहुत कम लगता है। इससे ना सिर्फ समय और ईंधन की बचत होती है, बल्कि व्यापारियों को कागजी कार्रवाई से भी हमेशा के लिए छुटकारा मिल जाता है।
जीएसटी नेटवर्क ने ई-वे बिल प्रणाली में डेटा की सटीकता और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए दो बड़े बदलावों का प्रस्ताव दिया था। इसमें ‘शिप-टू जीएसटीआईएन’ और ‘वॉलंटरी ई-वे बिल क्लोजर’ की नई सुविधा शामिल थी। इसे पहले 15 जून से पूरे देश में लागू करना तय हुआ था।
व्यापारियों को मिला अतिरिक्त समय अब एक अगस्त से लागू होगा नियम
इस नए फीचर की मदद से माल की डिलीवरी पूरी होने के बाद व्यापारी अपनी मर्जी से ई-वे बिल को पोर्टल पर तुरंत क्लोज कर सकेंगे। इससे माल भेजने से लेकर उसकी अंतिम डिलीवरी तक का एक पक्का डिजिटल रिकॉर्ड हमेशा के लिए सुरक्षित बन जाएगा। इससे विवादों का निपटारा आसान होगा।
हालांकि देश की कई बड़ी कंपनियों ने अपने ईआरपी सॉफ्टवेयर में तकनीकी बदलाव करने, एपीआई इंटीग्रेशन और टेस्टिंग के लिए सरकार से कुछ और समय मांगा था। कारोबारियों की इस व्यावहारिक मांग को देखते हुए सरकार ने इन नए नियमों को अब एक अगस्त 2026 से लागू करने का फैसला किया है।
Author: Rajesh Kumar

