इलाहाबाद हाई कोर्ट की यूपी पुलिस पर ऐतिहासिक टिप्पणी; कहा- अफसरों की वफादारी संविधान नहीं, सत्ताधारी दल के प्रति है

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Uttar Pradesh News: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर अब तक की सबसे तीखी और सख्त टिप्पणी की है। अदालत ने दो टूक शब्दों में कहा है कि राज्य के पुलिस अफसरों की वफादारी संविधान के प्रति नहीं, बल्कि सत्ताधारी दल के प्रति दिखाई देती है। फील्ड में तैनात अफसर ‘ट्रांसफर-पोस्टिंग इकोनमी’ को ध्यान में रखकर अपना आचरण तय कर रहे हैं।

न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकलपीठ ने गाजियाबाद निवासी राजेंद्र त्यागी और दो अन्य के खिलाफ दर्ज गैंग्सटर एक्ट की कार्रवाई को पूरी तरह निरस्त करते हुए यह ऐतिहासिक आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि अफसर केवल राजनीतिक नेतृत्व को खुश करने के लिए काम कर रहे हैं, जो कानून के शासन के लिए एक बेहद चिंताजनक स्थिति है।

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हाई कोर्ट की पीठ ने प्रशासनिक मशीनरी में राजनीतिक दखलअंदाजी को एक कड़वा सच बताया है। कोर्ट के अनुसार, विभिन्न सरकारों के कार्यकाल में ट्रांसफर, पोस्टिंग और प्रमोशन जैसी प्रक्रियाएं प्रतिभा के आधार पर होने के बजाय पूरी तरह राजनीतिक सरपरस्ती का औजार बन चुकी हैं। नियमों को ताक पर रखकर वफादार अफसरों को मलाईदार जिले इनाम में सौंपे जाते हैं।

दूसरी तरफ, जो अधिकारी पूरी ईमानदारी और स्वतंत्रता से काम करना चाहते हैं, उन्हें लगातार महत्वहीन जगहों पर भेजकर प्रताड़ित किया जाता है। अदालत ने पुलिस मुठभेड़ों, चुनिंदा क्रैकडाउन और असुविधाजनक माने जाने वाले नागरिकों के खिलाफ ‘यूपी गैंग्सटर एंड एंटी-सोशल एक्टिविटीज एक्ट 1986’ के हो रहे खुले दुरुपयोग पर भी गहरी चिंता व्यक्त की है।

गृह सचिव और पुलिस कमिश्नर की कार्यशैली पर उठाए गंभीर सवाल

अदालत ने कहा कि गृह सचिव को कानून-व्यवस्था में सरकार की नीतियों को पूरी तरह निष्पक्ष रूप से लागू करने वाला संवैधानिक प्राधिकार होना चाहिए। लेकिन व्यवहार में कुछ अफसर इस सर्वोच्च पद पर पहुंचकर पूरी तरह “स्वार्थी हितों के वाहक” बन जाते हैं। अधिकारियों में निष्पक्ष संवैधानिक सोच की जगह निजी या बाहरी स्वार्थ साफ दिखाई देते हैं।

इस मामले में कोर्ट ने गाजियाबाद के तत्कालीन पुलिस कमिश्नर अजय कुमार मिश्रा को भी कड़ी चेतावनी दी है। दरअसल, नियमानुसार जिलाधिकारी और पुलिस कमिश्नर की संयुक्त बैठक में ही गैंग चार्ट को मंजूरी मिलनी चाहिए थी। लेकिन जिलाधिकारी की अनुपस्थिति में पुलिस कमिश्नर ने अकेले ही इसे अनुमोदित कर दिया, जिसके तहत बहू सहित पूरे परिवार पर केस दर्ज किया गया था।

कानपुर के बिकरु कांड का जिक्र कर ‘संस्थागत जवाबदेही’ पर घेरा

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कानपुर के बहुचर्चित बिकरु कांड का विशेष रूप से उल्लेख किया है। इस भीषण घटना में विकास दुबे को पकड़ने गई टीम के आठ पुलिसकर्मी शहीद हो गए थे। कोर्ट ने आश्चर्य जताते हुए कहा कि पूरे ऑपरेशन की निगरानी में इतनी बड़ी चूक करने वाले आला अधिकारी को सजा के नाम पर महज एक ‘औपचारिक चेतावनी’ देकर छोड़ दिया गया।

अदालत ने साफ कहा कि ऐसी “संस्थागत जवाबदेही से मुक्ति” की गलत संस्कृति के कारण ही अफसर बेलगाम हो जाते हैं। सामंती मानसिकता वाले नेताओं और अफसरों ने संवैधानिक शासन को जनता की सेवा का माध्यम बनाने की बजाय अपनी निजी हुकूमत का औजार बना लिया है। राज्य तंत्र को हर हाल में सिर्फ और सिर्फ संविधान के प्रति जवाबदेह होना चाहिए।

Author: Ajay Mishra

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