Uttar Pradesh News: मेरठ और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में साइबर ठगी के डरावने पैटर्न का खुलासा हुआ है। अब अपराधी सॉफ्टवेयर के बजाय इंसानी दिमाग को हैक कर रहे हैं। मेरठ मंडल के 5200 मामलों की जांच में सामने आया कि 73 फीसदी लोग अपनी यादों से जुड़े पासवर्ड रखकर खुद कंगाल हो रहे हैं।
सोशल मीडिया प्रोफाइल बनी डिजिटल एक्स-रे रिपोर्ट
साइबर एक्सपर्ट्स के अनुसार फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप प्रोफाइल आज डिजिटल एक्स-रे की तरह काम कर रहे हैं। लोग अपने बच्चों के नाम, गाड़ी का नंबर और जन्मदिन जैसी निजी जानकारियां खुद इंटरनेट पर डाल रहे हैं। ठग इसी डेटा को खंगालकर लोगों के बैंक खातों में आसानी से सेंध लगा रहे हैं।
लापरवाही और कमजोर पासवर्ड से बढ़ा खतरा
स्टडी रिपोर्ट के मुताबिक करीब 31 फीसदी लोग बच्चों के नाम पर पासवर्ड रखते हैं। वहीं 22 फीसदी अपनी जन्मतिथि और 11 फीसदी मोबाइल नंबर का इस्तेमाल करते हैं। सिर्फ 8 फीसदी लोग ही मजबूत पासवर्ड चुनते हैं। इसी वजह से अपराधियों को बिना किसी हैकिंग के सीधी एंट्री मिल जाती है।
ह्यूमन हैकिंग बना ठगों का नया हथियार
अपराधी अब वायरस भेजने के बजाय पीड़ित की भावनाओं और आदतों का डिजिटल प्रोफाइल बनाते हैं। करीब 64 फीसदी लोग कई जगह एक ही पासवर्ड इस्तेमाल करते हैं। इसके अलावा 58 फीसदी लोगों ने दो साल से पासवर्ड नहीं बदला और 47 फीसदी ने टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन ऑन नहीं किया था।
एआई टूल्स मिनटों में क्रैक कर रहे पासवर्ड
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ने इस खतरे को कई गुना ज्यादा बढ़ा दिया है। पहले पासवर्ड का अनुमान लगाने में घंटों लगते थे, लेकिन अब एआई टूल्स कुछ ही मिनटों में सैकड़ों पैटर्न तैयार कर लेते हैं। तकनीकी कमजोरी से ज्यादा लोगों का डिजिटल व्यवहार ही इस बड़ी ठगी की मुख्य वजह बन रहा है।
एसपी क्राइम अवनीश कुमार और एक्सपर्ट आर्य त्यागी ने जनता को सचेत किया है। उन्होंने सुरक्षित रहने के लिए ‘सोचकर शेयर करें, सोचकर क्लिक करें और सोचकर पासवर्ड बनाएं’ का नया मंत्र दिया है। जब तक लोग अपना डिजिटल व्यवहार नहीं बदलेंगे, तब तक इस शातिर ठगी को रोकना नामुमकिन होगा।
Author: Ajay Mishra


