Delhi News: दिल्ली हाई कोर्ट ने सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि कोई भी व्यक्ति आरटीआई के तहत अपने पति या पत्नी की आय की जानकारी नहीं मांग सकता है। यह फैसला एक पति की याचिका पर सुनवाई करते हुए आया। पति ने अपनी आय की जानकारी पत्नी को देने के केंद्रीय सूचना आयोग के आदेश को चुनौती दी थी। अदालत ने इसे पूरी तरह से निजी जानकारी माना है।
निजी जानकारी को सार्वजनिक करने से छूट
न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव की पीठ ने मामले पर विस्तार से सुनवाई की। पीठ ने कहा कि आरटीआई कानून की धारा 8(1)(जे) के तहत निजी जानकारी सार्वजनिक करने पर पूरी तरह छूट है। अदालत ने साफ किया कि अगर विषय जनहित से नहीं जुड़ा है, तो जानकारी नहीं मिलेगी। सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुसार, इनकम टैक्स रिटर्न इसी निजी श्रेणी में आते हैं।
सीआईसी के आदेश को दी गई चुनौती
इस मामले में पत्नी और पति अलग-अलग रह रहे थे। पत्नी ने आयकर विभाग में अर्जी देकर अपने पति की वित्तीय वर्ष 2007-2008 की टैक्सेबल आय का पूरा ब्यौरा मांगा था। केंद्रीय सूचना आयोग ने आयकर अधिकारियों को यह जानकारी सार्वजनिक करने का सीधा निर्देश दिया था। इसी निर्देश के खिलाफ पति ने दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। कोर्ट ने याचिका स्वीकार की।
सार्वजनिक कामकाज में पारदर्शिता है मकसद
हाई कोर्ट की पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि आरटीआई अधिनियम का मुख्य उद्देश्य सरकारी और सार्वजनिक कामकाज में पूरी तरह पारदर्शिता लाना है। अदालत ने टिप्पणी की कि व्यक्तियों की किसी भी निजी जानकारी को सार्वजनिक करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। ऐसी व्यक्तिगत जानकारी का आम जनता से सीधा कोई लेना-देना नहीं होता है। अदालत ने आय को निजी जानकारी माना है।
भरण-पोषण के लिए अन्य कानूनी विकल्प
सुनवाई के दौरान महिला ने तर्क दिया था कि भरण-पोषण के दावे पर उचित फैसला लेने के लिए पति की आय जानना जरूरी है। महिला का कहना था कि यह जानकारी उसके अधिकार क्षेत्र में आती है। हालांकि, हाई कोर्ट की पीठ ने महिला की इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि भरण-पोषण के लिए महिला के पास अन्य कई कानूनी उपाय मौजूद हैं।


