Delhi News: दिल्ली हाई कोर्ट ने वर्ष 2016 के चर्चित सिविल लाइन्स हिट एंड रन मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने उस समय के नाबालिग आरोपी (सीसीएल) के खिलाफ आईपीसी की धारा 304 भाग-दो (गैर-इरादतन हत्या) के तहत मुकदमा चलाने के निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा है। न्यायमूर्ति अमित महाजन की पीठ ने स्पष्ट किया कि आरोपी बिना ड्राइविंग लाइसेंस के तेज रफ्तार गाड़ी चलाने का आदी था, इसलिए ट्रायल कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप का कोई कानूनी आधार नहीं बनता।
अदालत ने खारिज की आरोपी की याचिका
न्यायमूर्ति अमित महाजन ने आरोपी द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया। यह याचिका 18 मार्च 2023 के किशोर न्याय बोर्ड (JJB) के उस आदेश के खिलाफ थी, जिसमें आरोपी पर कड़ी धाराओं में आरोप तय करने की बात कही गई थी। हाई कोर्ट ने कहा कि आरोपी को इस बात की पूरी जानकारी थी कि उसकी लापरवाही से किसी की जान जा सकती है। बचाव पक्ष के उन तर्कों को भी ठुकरा दिया गया जिसमें केवल तेज रफ्तार को इस धारा के लिए पर्याप्त नहीं माना जा रहा था।
इन तथ्यों के आधार पर कोर्ट ने नहीं दी राहत
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कई अहम बिंदुओं को रेखांकित किया। घटना के वक्त आरोपी की उम्र 17 साल 11 महीने और 26 दिन थी। वह मर्सिडीज कार को करीब 80-100 किमी प्रतिघंटा की रफ्तार से चला रहा था, जबकि उस सड़क पर गति सीमा केवल 50 किमी प्रतिघंटा थी। साथ ही, कार में सवार अन्य गवाहों ने बयान दिया कि आरोपी को लापरवाही से गाड़ी चलाने की आदत थी। फोरेंसिक रिपोर्ट के अनुसार, मौके पर ब्रेक लगाने के कोई निशान (Skid Marks) नहीं मिले, जिससे उसकी मंशा पर सवाल खड़े हुए।
क्या है साल 2016 का चर्चित मामला
यह घटना 4 अप्रैल 2016 की रात को सिविल लाइन्स स्थित शामनाथ मार्ग पर हुई थी। आरोपी नाबालिग चालक ने अपनी मर्सिडीज बेंज कार से सड़क पार कर रहे सिद्धार्थ शर्मा को जोरदार टक्कर मारी थी। टक्कर इतनी भीषण थी कि सिद्धार्थ हवा में 15-20 फीट उछलकर दूर जा गिरे और उनकी मौत हो गई। पूरी घटना सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई थी। हालांकि, शुरुआत में उसे बालिग मानकर केस चलाने की कोशिश हुई थी, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उसे नाबालिग ही माना।
सजा के प्रावधानों का अंतर
इस मामले में धारा 304ए और 304 भाग-दो के बीच कानूनी लड़ाई थी। धारा 304ए लापरवाही से मौत के लिए है, जिसमें अधिकतम दो साल की सजा होती है। इसके विपरीत, धारा 304 भाग-दो गैर-इरादतन हत्या की श्रेणी में आती है। यह तब लागू होती है जब आरोपी को पता हो कि उसके कृत्य से मौत हो सकती है। इसके तहत दोषी पाए जाने पर 10 साल तक की कैद या जुर्माना, अथवा दोनों का प्रावधान है। हाई कोर्ट के इस निर्णय से अब आरोपी पर इसी गंभीर धारा में मुकदमा चलेगा।


