Punjab Politics: राम रहीम की पैरोल और डेरों की खामोशी, क्या 2027 के महामुकाबले से पहले पंजाब में पलटने वाली है सत्ता की बाजी?

Punjab News: पंजाब की सियासत में हमेशा से एक कहावत बहुत मशहूर रही है, जिसके साथ डेरे उसके साथ वोटों के घेरे। सूबे में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव में अब एक साल से भी कम समय बचा है। स्थानीय निकाय चुनाव के नतीजों के बीच राज्य के ताकतवर डेरों की राजनीतिक सक्रियता अचानक बहुत तेज हो गई है।

हाल ही में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह 30 दिनों की पैरोल पर जेल से बाहर आया है। राम रहीम के बाहर आते ही मालवा, दोआबा और माझा के सियासी गलियारों में हलचल मच गई है। सभी राजनीतिक दल अब यह भांपने में जुटे हैं कि इस बार ‘डेरा फैक्टर’ किस करवट बैठेगा।

आजादी से पहले शुरू हुआ था डेरों का रसूख

पंजाब की राजनीति और इन डेरों का रिश्ता बेहद पुराना है। सन 1947 में हुए देश के विभाजन से पहले भी विभिन्न संप्रदायों के डेरे पंजाब के सामाजिक जीवन को प्रभावित करते थे। शुरुआती दौर में अकाली राजनीति पूरी तरह से शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) और सिख धार्मिक संस्थाओं के इर्द-गिर्द ही घूमती रही।

दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी के पूर्व संगठन जनसंघ ने शहरी व्यापारियों को साधने के लिए हमेशा आर्य समाज का सहारा लिया। धर्मनिरपेक्षता का दावा करने वाली कांग्रेस भी इस खेल में कभी पीछे नहीं रही। ज्ञानी जैल सिंह ने अकाली दल को रोकने के लिए दमदमी टकसाल के जरनैल सिंह भिंडरावाले को परोक्ष बढ़ावा दिया था।

संत रामानंद की हत्या से बदली सूबे की दलित राजनीति

मई 2009 में ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना में कट्टरपंथियों द्वारा संत रामानंद की हत्या कर दी गई थी। इस दुखद घटना के बाद पंजाब की सड़कों पर भयंकर दलित आक्रोश और हिंसा भड़की थी। इस आंदोलन ने साबित कर दिया कि जालंधर के डेरा सचखंड बल्लां के एक इशारे पर पूरा पंजाब थम सकता है।

इस हिंसक घटना के बाद डेरे ने सिख धर्म से अलग होकर एक नए ‘रविदासिया धर्म’ की घोषणा की थी। उन्होंने अपने नए ग्रंथ ‘अमृतवाणी’ को भी स्वीकार किया। इसके बाद से ही पंजाब की पारंपरिक राजनीति में बड़ा बदलाव आया और चुनावी समीकरणों में दलित समाज एक स्वतंत्र और मजबूत शक्ति बनकर उभरा।

डेरा सच्चा सौदा और ब्यास बने वोटों की साइलेंट ताकत

पंजाब के मालवा क्षेत्र में विधानसभा की सबसे ज्यादा 69 सीटें आती हैं। यहां डेरा सच्चा सौदा का प्रभाव सबसे निर्णायक माना जाता है। इस डेरे का एक विशेष ‘पॉलिटिकल विंग’ है। यह विंग चुनाव से ठीक एक दिन पहले अपने करोड़ों अनुयायियों को किसी एक राजनीतिक दल को एकमुश्त वोट देने का गुप्त निर्देश देता है।

इसके विपरीत अमृतसर के पास स्थित डेरा ब्यास की कूटनीति बिल्कुल अलग और शांत है। यह डेरा कभी भी किसी राजनीतिक मंच पर खुलकर सामने नहीं आता है। देश के प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक इस डेरे के प्रमुख के सामने सिर झुकाते हैं। इस डेरे का मौन समर्थन ही किसी भी दल की किस्मत बदल देता है।

दोआबा के दलितों ने बदली चुनावी परिणामों की तस्वीर

पंजाब में देश की सबसे बड़ी दलित आबादी रहती है, जो कुल जनसंख्या का 30 प्रतिशत से अधिक है। यही वजह है कि राज्य में अब ‘दलित डेरे’ सबसे बड़े पावर सेंटर बन चुके हैं। दोआबा क्षेत्र का रविदासिया चमार और आद-धर्मी समाज आज आर्थिक और सामाजिक रूप से बेहद मजबूत और एकजुट माना जाता है।

जालंधर, कानपुर और कोलकाता के चमड़ा उद्योग में इस समाज की बहुत बड़ी हिस्सेदारी रही है। इसके बाद 1960 और 70 के दशक में इस समाज के लोग बड़ी संख्या में ब्रिटेन, अमेरिका और खाड़ी देशों में जाकर बस गए। विदेशों से आने वाले भारी फंड ने इन दलित डेरों की पूरी कायापलट कर दी है।

चुनाव नजदीक आते ही डेरों के सामने नतमस्तक हुए नेता

पंजाब के इतिहास में बड़े से बड़ा नेता हमेशा इन डेरों के सामने नतमस्तक रहा है। मौजूदा समय में भी शिरोमणि अकाली दल के शीर्ष नेतृत्व ने डेरा बेबे जौरे और संत निर्मल दास से संपर्क साधा है। दूसरी तरफ योग गुरु बाबा रामदेव ने भी हाल ही में कई बड़े डेरों का दौरा किया है।

सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी और भाजपा के नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों भी इन डेरों के चक्कर काट रहे हैं। सभी बड़े नेता डेरों के जरिए ग्रामीण वोट बैंक को अपने पाले में करने की जुगत में हैं। इस बार भी जीत की चाबी इन्हीं डेरा प्रमुखों के फैसलों में सुरक्षित है।

Author: Harikarishan Sharma

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