बीआर चोपड़ा की ‘महाभारत’ के संजय अब कहां हैं? जानें धृतराष्ट्र को आंखों देखा हाल सुनाने वाले अभिनेता की कहानी

Entertainment News: बी.आर. चोपड़ा की ‘महाभारत’ भारतीय टेलीविजन इतिहास का वह सुनहरा अध्याय है, जिसे आज भी कोई दूसरा शो नहीं दोहरा पाया। इस धारावाहिक का हर पात्र जीवंत था, लेकिन धृतराष्ट्र के सारथी ‘संजय’ की भूमिका निभाने वाले अभिनेता ललित मोहन तिवारी ने अपनी संवाद अदायगी से दर्शकों के दिलों में खास जगह बनाई। कुरुक्षेत्र युद्ध का आंखों देखा हाल सुनाने वाले संजय यानी ललित मोहन तिवारी आज ग्लैमर की चकाचौंध से दूर एक शांत और सम्मानित जीवन जी रहे हैं।

सरकारी नौकरी छोड़ अभिनय में आजमाया था भाग्य

ललित मोहन तिवारी का अभिनेता बनने का सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत में करीब पांच साल तक सरकारी नौकरी की थी। एक सुरक्षित भविष्य को छोड़कर उन्होंने अभिनय के क्षेत्र में आने का बड़ा जोखिम लिया। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) से स्नातक ललित का यह रिस्क उनके लिए बेहद फलदायी साबित हुआ। उन्होंने महाभारत में ‘संजय’ के रूप में जो गंभीरता और गहराई पेश की, उसकी प्रशंसा आज भी फिल्म समीक्षकों द्वारा की जाती है।

महाभारत की अपार सफलता के बाद ललित मोहन तिवारी ने बड़े पर्दे पर भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। उन्होंने साल 1987 में फिल्म ‘ये वो मंजिल तो नहीं’ से बॉलीवुड में कदम रखा था। इसके बाद उन्होंने यश चोपड़ा जैसे दिग्गज निर्देशकों के साथ काम किया। वे ‘चांदनी’, ‘लम्हे’, ‘डर’ और ‘ओम-दर-बा-दर’ जैसी कल्ट फिल्मों का हिस्सा रहे। शाहरुख खान और अनिल कपूर जैसे सुपरस्टार्स के साथ काम करने के बावजूद उन्होंने कभी अपनी सादगी को नहीं खोया।

नैनीताल में बिता रहे हैं समय, सिखा रहे हैं एक्टिंग के गुर

मौजूदा समय में ललित मोहन तिवारी लाइमलाइट से काफी दूर उत्तराखंड के खूबसूरत शहर नैनीताल में अपने निजी आवास पर रहते हैं। हालांकि, उन्होंने अभिनय से पूरी तरह दूरी नहीं बनाई है, बल्कि अब वे आने वाली पीढ़ी को तराशने का काम कर रहे हैं। वे एक प्रतिष्ठित एक्टिंग ट्रेनर के रूप में सक्रिय हैं और थिएटर आर्टिस्ट्स को प्रशिक्षित करते हैं। वे आज भी दिल्ली स्थित नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) में बतौर अतिथि प्रशिक्षक अपनी सेवाएं देते रहते हैं।

कला और अभिनय के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें काफी सम्मान भी मिला है। करीब दो साल पहले कुमाऊं विश्वविद्यालय के 19वें दीक्षांत समारोह में उन्हें मानद उपाधि से सम्मानित करने का ऐलान किया गया था। ललित मोहन तिवारी का मानना है कि अभिनय केवल प्रसिद्ध होने का जरिया नहीं, बल्कि एक साधना है। आज वे नैनीताल की शांत वादियों में रहकर अपनी कला के माध्यम से समाज और नई पीढ़ी को प्रेरित कर रहे हैं।

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