कर्बला डायरी: शबीह-ए-पैगंबर हजरत अली अकबर की शहादत की वो दर्दनाक दास्तां, जिसे सुन आज भी रो पड़ती है इंसानियत

Delhi News: इराक का कर्बला महज एक जंग का मैदान नहीं, बल्कि हक और इंसाफ के लिए दी गई महान कुर्बानियों की वो दास्तां है जो कयामत तक जिंदा रहेगी। यजीद की क्रूर फौज ने मोहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों को तीन दिन का भूखा-प्यासा शहीद कर दिया था।

शहीदों की इस फेहरिस्त में एक ऐसा नौजवान भी शामिल था, जिसे देखकर लोगों को खुद रसूल-ए-अकरम की याद आ जाती थी। वह थे इमाम हुसैन के 18 वर्षीय लाडले बेटे हजरत अली अकबर (अ.स.)। शक्ल, सीरत और बातचीत में हूबहू पैगंबर साहब जैसे होने के कारण उन्हें ‘शबीह-ए-पैगंबर’ कहा जाता था।

जब 18 साल के जवान ने मांगी मौत की रजा

कर्बला में 7 मोहर्रम से यजीदी फौज ने पानी बंद कर दिया था। चारों तरफ ‘अल-अतश’ (हाय प्यास) की गूंज थी। 10 मोहर्रम की सुबह जब यजीद की फौज ने हमला तेज किया, तो अली अकबर ने पिता से जंग की इजाजत मांगी। एक बाप के लिए अपने जवान बेटे को मौत के मुंह में भेजना आसान नहीं था।

इमाम हुसैन ने तड़पकर कहा कि तुम तो मेरी आंखों का नूर हो, तुम्हें जंग की इजाजत कैसे दे दूं? तब अली अकबर ने दृढ़ता से कहा कि बाबा, जब अल्लाह की राह में हमारे साथी कुर्बान हो रहे हैं, तो मैं पीछे कैसे रह सकता हूं? फूफी जनाबे जैनब ने भी भारी दिल से अपने चहेते को विदा किया।

मैदान-ए-जंग में पराक्रम और सीने पर बरछी का वार

जंगी लिबास पहनकर जब अली अकबर मैदान में उतरे, तो उन्होंने यजीदी फौज को ललकारा और हक का रास्ता दिखाया। उन्होंने पूछा कि क्या तुम्हारी आंखों पर पर्दा पड़ गया है जो रसूल के कुनबे का खून बहाने आए हो? इसके बाद उन्होंने यजीद के कई ताकतवर सिपहसालारों को मार गिराया।

जब यजीदी फौज अकेले अली अकबर का मुकाबला नहीं कर पाई, तो उन्होंने चारों तरफ से घेरकर वार करना शुरू कर दिया। इसी बीच एक जालिम ने अली अकबर के सीने पर बरछी से ऐसा जोरदार वार किया कि वह सीधे घोड़े से जमीन पर आ गिरे और तड़पकर अपने पिता को आवाज दी।

बाप के हाथों में दम तोड़ता जवान बेटा

इमाम हुसैन गिरते-संभलते जब अपने लाल के पास पहुंचे, तो अली अकबर ने कहा कि बाबा, सीने से बरछी निकाल दीजिए, बहुत दर्द हो रहा है। मजबूर बाप ने जैसे ही बरछी खींची, अली अकबर का कलेजा भी बाहर आ गया। 18 साल के जवान बेटे की लाश देखकर इमाम हुसैन का कलेजा फट गया।

जब खून से लथपथ लाशा खेमे में आया, तो मां और फूफी की चीखों से आसमान दहल उठा। हजरत अली अकबर की यह शहादत दुनिया के युवाओं को सिखाती है कि हक और दीन की हिफाजत के लिए कोई भी उम्र छोटी नहीं होती। जुल्म के आगे सिर झुकाने से बेहतर इज्जत की मौत चुनना है।

Author: Pandit Balkrishan Sharma

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