India News: राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद की किताब का विवादित मामला फिर गरमा गया है। न्यायपालिका पर चैप्टर लिखने वाले तीन शिक्षाविदों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। शीर्ष अदालत ने हाल ही में इन तीनों विशेषज्ञों को सरकारी प्रोजेक्ट्स से ब्लैकलिस्ट कर दिया था। अब इन शिक्षाविदों ने सर्वोच्च अदालत से अपना पक्ष सुनने की अपील की है। उन्होंने खुद को इस विवाद में फंसाए जाने पर अपना स्पष्टीकरण भी दिया है।
सामूहिक प्रक्रिया का दिया गया तर्क
वरिष्ठ अधिवक्ता जे साई दीपक ने शिक्षाविद सुपर्णा दिवाकर की तरफ से अदालत में अहम दलीलें पेश कीं। उन्होंने बताया कि चैप्टर लिखना एक सामूहिक प्रक्रिया का हिस्सा था। किसी एक व्यक्ति का इस पर कोई एकाधिकार नहीं था। वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने भी अदालत से शिक्षाविदों का पक्ष सुनने का अनुरोध किया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने आवेदनों को रिकॉर्ड पर लेने का निर्देश दिया है। अब इस मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद होगी।
‘हम कोई रातों-रात आए शिक्षाविद नहीं’
अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत में शिक्षाविदों का मजबूत पक्ष रखा। उन्होंने पीठ को बताया कि ये विशेषज्ञ काफी विश्वसनीयता रखते हैं। वे कोई रातों-रात चर्चा में आए साधारण व्यक्ति नहीं हैं। इन विशेषज्ञों में प्रोफेसर मिशेल डैनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्ना शामिल हैं। अधिवक्ता ने नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति की शिक्षण पद्धति का भी जिक्र किया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि शिक्षाविद अपनी बात का सही संदर्भ पेश करना चाहते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने उठाया था सख्त कदम
सुप्रीम कोर्ट ने इस विवादित चैप्टर का स्वत: संज्ञान लिया था। यह चैप्टर कक्षा आठवीं की सामाजिक विज्ञान की किताब में प्रकाशित हुआ था। ग्यारह मार्च को अदालत ने तीनों विशेषज्ञों के खिलाफ कड़ा एक्शन लिया था। केंद्र और राज्य सरकारों को इन विशेषज्ञों से दूरी बनाने का सख्त निर्देश दिया गया था। अदालत का मानना था कि इन विशेषज्ञों ने जानबूझकर न्यायपालिका की गलत छवि पेश की है। इसके बाद किताब पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया था।
एनसीईआरटी ने अदालत से मांगी थी माफी
इस विवाद के बाद एनसीईआरटी निदेशक प्रोफेसर दिनेश प्रसाद सकलानी ने हलफनामा दायर किया था। उन्होंने विवादित चैप्टर शामिल करने के लिए अदालत से बिना शर्त माफी मांगी थी। सरकार ने मामले को सुलझाने के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया है। इस अहम समिति में पूर्व जज और वरिष्ठ वकील शामिल हैं। अब अदालत तय करेगी कि ब्लैकलिस्ट किए गए शिक्षाविदों को राहत मिलेगी या नहीं। सभी की नजरें सुप्रीम कोर्ट के अगले फैसले पर टिकी हुई हैं।


