Shimla News: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने शिमला के भट्टाकुफर में फोरलेन निर्माण से गिरे बहुमंजिला मकान के मामले में कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने मुख्य सचिव, एनएचएआई, डीसी और एसडीएम ग्रामीण शिमला से पूछा है कि क्या असली पीड़ित रंजना देवी को मुआवजा मिला है। फोरलेन निर्माण के दौरान हुए भूस्खलन से एक रिहायशी इमारत जमींदोज हो गई थी। इस मामले में कोर्ट ने सरकार और निर्माण कंपनी से जवाब तलब करते हुए मुआवजे की स्थिति स्पष्ट करने को कहा है।
सुनवाई के दौरान निर्माण कंपनी ‘गावर’ ने अदालत में एक हैरान करने वाला दावा किया है। कंपनी ने बताया कि जिस महिला चंदा देवी ने मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर मुआवजे की मांग की थी, उनका मकान नहीं गिरा है। कंपनी के अनुसार असल में मकान रंजना देवी का था जो पूरी तरह नष्ट हो गया। इस नए मोड़ ने मुआवजे के दावों को संदिग्ध परिस्थितियों में डाल दिया है। इसके बाद अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच तेज कर दी है।
मुख्य न्यायाधीश ने लिया स्वतः संज्ञान
यह मामला तब सुर्खियों में आया जब चंदा देवी ने मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर इंसाफ की गुहार लगाई थी। मुख्य न्यायाधीश ने इस पत्र को जनहित याचिका मानते हुए स्वतः संज्ञान लिया था। उन्होंने राज्य के मुख्य सचिव, एनएचएआई परियोजना निदेशक और स्थानीय प्रशासन को नोटिस जारी किए थे। पत्र में आरोप था कि एनएच-5 पर ढली सेक्शन के पास फोरलेन कार्य की वजह से ही साढ़े तीन मंजिला मकान गिरा है। इसके कारण परिवार को भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा है।
मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बीसी नेगी की खंडपीठ ने इस केस में बड़ा आदेश दिया है। अदालत ने सड़क निर्माण करने वाली कंपनी मैसर्स गावर शिमला हाईवे प्राइवेट लिमिटेड को भी प्रतिवादी बनाया है। अब निर्माण कंपनी को कोर्ट में अपनी सफाई देनी होगी। प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी गलत व्यक्ति को सरकारी धन न मिले और असली हकदार को तुरंत मुआवजा दिया जाए। मामले की अगली सुनवाई में इन सभी बिंदुओं पर विस्तार से चर्चा होगी।

