National News: भारत और अमेरिका के बीच बढ़ते रक्षा संबंधों ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। विशेष रूप से ‘लेमोआ’ (LEMOA) समझौते को लेकर कई तरह की चर्चाएं और सस्पेंस बना हुआ है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या युद्ध की स्थिति में अमेरिका भारतीय सैन्य अड्डों का इस्तेमाल किसी देश पर हमले के लिए कर सकता है? इस रक्षा समझौते की बारीकियां भारत की संप्रभुता और सुरक्षा रणनीति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण हैं, जिन्हें समझना हर भारतीय के लिए जरूरी है।
क्या है लेमोआ समझौता और क्यों मचा है बवाल?
लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट (LEMOA) भारत और अमेरिका के बीच एक प्रमुख रक्षा समझौता है। यह दोनों देशों की सेनाओं को एक-दूसरे के सैन्य अड्डों से रसद आपूर्ति, ईंधन और मरम्मत की सुविधा लेने की अनुमति देता है। हालांकि, इसे लेकर अक्सर यह भ्रम फैलाया जाता है कि अमेरिका भारत में अपने पक्के सैन्य ठिकाने बना लेगा। असल में, यह समझौता केवल रसद सहायता तक सीमित है और इसमें बेस बनाने का कोई प्रावधान नहीं है।
हमलों के लिए अड्डों का इस्तेमाल: हकीकत या अफवाह?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अमेरिकी लड़ाकू विमान भारत से उड़ान भरकर दुश्मन पर हमला कर सकते हैं? आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, लेमोआ किसी भी देश को हमले के लिए दूसरे की जमीन इस्तेमाल करने का अधिकार नहीं देता। यह केवल मानवीय सहायता, आपदा राहत और साझा सैन्य अभ्यासों के दौरान एक-दूसरे की मदद करने का तंत्र है। भारत ने हमेशा अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को प्राथमिकता दी है और किसी भी विदेशी सेना को आक्रामक कार्रवाई की अनुमति नहीं दी है।
चीन और पाकिस्तान के लिए क्या है इसके मायने?
इस समझौते से हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की ताकत काफी बढ़ गई है। अमेरिकी रसद सुविधाओं तक पहुंच होने से भारतीय नौसेना की पहुंच अब बहुत दूर तक हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि लेमोआ समझौते ने चीन के बढ़ते दखल को चुनौती दी है। हालांकि भारत इसे विशुद्ध रूप से रक्षा सहयोग मानता है, लेकिन रक्षा गलियारों में इसे क्षेत्र की सुरक्षा के लिए एक ‘गेम चेंजर’ कदम के रूप में देखा जा रहा है।

