Himachal News: सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के एक मामले में गुरुवार को बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगर मरने से पहले दिया गया बयान (Dying Declaration) सच्चा है, तो मकसद (Motive) साबित करना जरूरी नहीं है। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने यह अहम टिप्पणी की। सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें आरोपी पति को बरी कर दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि पत्नी का आखिरी बयान भरोसेमंद है। इसके बाद बेंच ने आरोपी चमन लाल की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा।
पत्नी पर केरोसिन डालकर लगाई थी आग
यह दिल दहला देने वाली घटना 7 दिसंबर 2009 की है। हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले के रामपुर गांव में चमन लाल ने अपनी पत्नी सरो देवी पर केरोसिन छिड़का था। इसके बाद उसने पत्नी को आग के हवाले कर दिया। गंभीर हालत में सरो देवी को अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उनकी मौत हो गई। मरने से पहले सरो देवी ने मजिस्ट्रेट को अपना बयान दिया था। उन्होंने बताया था कि पति उनसे रोज झगड़ा करता था। वह उन्हें ‘कंजरी’ (बदचलन) कहता था और घर से निकालने की धमकी देता था।
हाईकोर्ट ने बरी किया, सुप्रीम कोर्ट ने लगाई फटकार
निचली अदालत ने चमन लाल को हत्या का दोषी माना था। लेकिन हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने उसे बरी कर दिया था। हाईकोर्ट ने बयान दर्ज करने के समय और तहसीलदार की भूमिका पर शक जताया था। सुप्रीम कोर्ट ने इन तर्कों को खारिज कर दिया। बेंच ने कहा कि हाईकोर्ट का संदेह बेबुनियाद है। रिकॉर्ड पर मौजूद सबूत बताते हैं कि पीड़िता का बयान पूरी तरह स्वैच्छिक और सच्चा था। वह बयान देते समय पूरे होश में थी।
मकसद साबित करना हर बार जरूरी नहीं
जस्टिस आर. महादेवन ने फैसला लिखते हुए कानून की स्थिति साफ की। उन्होंने कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों (Circumstantial Evidence) वाले मामलों में मकसद बहुत अहम होता है। लेकिन जब सीधा गवाह या मरने वाले का भरोसेमंद बयान मौजूद हो, तो मकसद का महत्व कम हो जाता है। अगर ‘डाइंग डिक्लेरेशन’ मजबूत है, तो केवल मकसद साबित न होने से मुजरिम बच नहीं सकता। कोर्ट ने माना कि पति का लगातार दुर्व्यवहार ही इस अपराध की वजह बना।
