New Delhi News: भारत के इतिहास में एक ऐसा गणतंत्र दिवस भी आया था, जिसने सबको हैरान कर दिया था। साल 1955 में भारत ने एक ऐसे शख्स को मुख्य अतिथि बनाया, जो पाकिस्तान में लोकतंत्र का गला घोंट रहा था। पंडित नेहरू की सरकार ने पाकिस्तान के गवर्नर जनरल मलिक गुलाम मोहम्मद को न्योता भेजा था। यह वही साल था जब राजपथ (अब कर्तव्य पथ) पहली बार परेड का गवाह बना। यह गणतंत्र दिवस कई नई परंपराओं की शुरुआत का गवाह भी बना था।
कश्मीर के खिलाफ साजिश रचने वाला बना मेहमान
मलिक गुलाम मोहम्मद पाकिस्तान का वही गवर्नर जनरल था, जिसने वहां दो बार तख्तापलट किया। उसने 1953 में ख्वाजा नजीमुद्दीन की चुनी हुई सरकार को बर्खास्त कर दिया था। उसकी भूख यहीं शांत नहीं हुई। उसने 1954 में पाकिस्तान की संविधान सभा को भी भंग कर दिया था। अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से पढ़े मलिक ने जनरल अयूब खान की मदद से सत्ता पर कब्जा जमाया था। हैरानी की बात यह है कि जम्मू-कश्मीर के खिलाफ लगातार साजिश रचने वाला यह शख्स 1955 के गणतंत्र दिवस समारोह में राजपथ पर बैठा था।
पहली बार राजपथ पर निकली परेड
साल 1955 का गणतंत्र दिवस समारोह सिर्फ मुख्य अतिथि के कारण ही नहीं, बल्कि स्थान के कारण भी खास था। 1950 से 1954 तक परेड इरविन स्टेडियम (अब मेजर ध्यानचंद स्टेडियम), लाल किला या रामलीला मैदान में होती थी। 1955 में पहली बार राजपथ को स्थायी वेन्यू बनाया गया। यहीं से परेड के उस रूट की शुरुआत हुई, जिसे हम आज देखते हैं। राजपथ अब कर्तव्य पथ बन चुका है, लेकिन परंपरा 1955 से ही चली आ रही है।
भव्यता और सैन्य ताकत का प्रदर्शन
शुरुआती सालों में गणतंत्र दिवस परेड काफी छोटी होती थी। 1955 में इस समारोह का स्वरूप पूरी तरह बदल गया। इसमें पहली बार तीनों सेनाओं- थल सेना, नौसेना और वायुसेना ने एक साथ हिस्सा लिया। इसी साल भारतीय वायुसेना का फ्लाईपास्ट भी परेड का हिस्सा बना। 1950 में सांस्कृतिक झांकियां नहीं होती थीं, लेकिन 1955 से राज्यों की झांकियां और सांस्कृतिक कार्यक्रम परेड की शान बन गए। इस बदलाव ने समारोह को भव्य बना दिया।
