यहां आदिवासी और मतुआ वोटर्स निर्णायक भूमिका में, कूचबिहार हिंसा को मुद्दा बना रही ममता

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आदिवासियों के प्रतीक पुरुष ‘बिरसा मुंडा’ और ‘सिद्धू कानू’ को यहां चुनावी मौदान में उतार दिया गया है। ‘श्रीराम’ तो पहले से हैं ही। भाजपा ‘बिरसा मुंडा-सिद्धू कानू स्वाभिमान यात्रा’, के सहारे आदिवासियों की खासी तादाद वाले इस इलाके में वोटरों को साधने की कोशिश कर रही है। वहीं दूसरी तरफ कूचबिहार की चुनावी हिंसा ने ममता बनर्जी को अपनों को चार्ज करने का बड़ा मौका दिया है। वह इसका भरपूर इस्तेमाल कर रहीं हैं। हालांकि भाजपा भी पीछे नहीं है। वो भी काउंटर अटैक कर इसका पूरा फायदा लेने की कोशिश में है।

दरअसल, यह इलाका कूचबिहार हिंसा से बहुत मजबूत हुई ध्रुवीकरण की नौबत का पूरा फायदा उठाने की चुनावी होड़ की खुली गवाही है। भाजपा और TMC में से कोई, किसी से, किसी भी स्तर पर पीछे नहीं रहना चाहता। चुनाव की निकटता के साथ दोनों के सेनानियों की तनातनी, टकराहट बढ़ी है। नेता अपनी तल्ख जुबान से इसे लगातार बढ़ा रहे। यहां भी कोई बड़ी घटना हो जाए तो आश्चर्य नहीं।

भाजपा अभी से सरकार बनाने का दावा कर रही

अब भाजपा की पूरी कवायद अपने वोटरों को बेधड़क बूथ तक पहुंचा देने की है। वह लोगों को सुरक्षा का भरोसा दे रहे हैं। उसके तमाम छोटे-बड़े नेता लोगों को यह समझाने में लगे हैं कि बंगाल में भाजपा की सरकार बन चुकी है। 2 मई को इसकी औपचारिकता पूरी हो जाएगी। तब TMC से जुड़े या उससे संरक्षित तमाम अपराधी जेल में होंगे। लिहाजा, बिना डरें वोट दें।

UP के CM योगी आदित्यनाथ एक सभा के दौरान। वे यहां जय श्रीराम और मुस्लिम तुष्टीकरण पर भरपूर फोकस कर रहे हैं।

UP के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस लाइन से सुरक्षा की थोक गारंटी बांट रहे हैं- ‘अपराधी पाताल में भी छिपे होंगे, तो भी हम उन्हें पकड़ लेंगे।’ इस क्रम में भाजपाइयों ने ममता बनर्जी के चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर के ऑडियो टेप इस रूप में खूब प्रचारित किया है कि अब तो वे मान चुके हैं कि ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हीरो हैं, ध्रुवीकरण हुआ; नतीजतन भाजपा जीत चुकी है।’

इलाके में एक नई कवायद भी दिखी। AIMIM सुप्रीमो असदुद्दीन ओवैसी और कांग्रेसी-कम्युनिस्ट, दोनों भाजपा और TMC को एक बता रहे। खासकर ओवैसी का मकसद ममता के पाले वाले वोटों का बिखराव है। हालांकि, वे इसमें कामयाब नहीं दिखते। मयनागुड़ी के अब्दुल रहमान ने कहा- ‘हम ओबेसी साहब के कारनामों का मकसद समझते हैं।’

लोकसभा में भाजपा ने लहराया परचम

जलपाईगुड़ी लोकसभा क्षेत्र 2014 में TMC के कब्जे में आया। उसने CPM से यह सीट छीनी। 1999, 2004, 2009 के चुनावों को CPM जीतती रही। किंतु, पिछला यानी 2019 का लोकसभा चुनाव भाजपा जीत गई। यह इस इलाके में उसके नियोजित फैलाव का नतीजा रहा। बेशक, CAA-NRC, घुसपैठ, TMC का अल्पसंख्यक तुष्टिकरण जैसे बेहद संवेदनशील मुद्दों ने भाजपा को यहां जड़ जमाने, मजबूत करने में बड़ी मदद की। इस बार यह सबकुछ बहुत ज्यादा आगे बढ़ा हुआ है।

पिछले विधानसभा चुनाव में जलपाईगुड़ी को छोड़कर सभी सीटों को TMC जीती थी। जलपाईगुड़ी सीट पर कांग्रेसी उम्मीदवार जीते। मगर बीते लोकसभा चुनाव के नतीजों ने विधानसभा क्षेत्रों के हिसाब से TMC को परेशान सा किया हुआ है। मगर घुपगुड़ी के शांतनु चक्रवर्ती ने इसे खारिज किया। कहा-लोकसभा के हिसाब से विधानसभा चुनाव को नहीं देखना चाहिए।

मतुआ समाज का भी अहम रोल है

इलाके में मतुआ समुदाय का खासा असर है। इनका TMC की तुलना में बहुत ज्यादा झुकाव भाजपा की तरफ है। कमोबेश यही स्थिति राजवंशी समुदाय के लोगों की भी है। ममता इसकी क्षतिपूर्ति नाश्य शेख समुदाय में देखी हैं। किंतु इसकी प्रतिक्रिया में होने वाली गोलबंदी, भाजपा के लिए फायदेमंद रहेगी। इसके साथ ही यहां योगेंद्र यादव, मेधा पाटकर की टोली भी घूम रही है। ये सब लोगों को भाजपा को वोट नहीं देने को कह रहे हैं। लेकिन, यह बस वैसी बौद्धिक चर्चा तक सीमित है, जिसका भावनात्मक व संवेदनशील मसलों के सामने शायद ही कोई मतलब है।

यहां भी ‘श्रीराम’ का बड़ा सहारा हैं। योगी आदित्यनाथ एक सभा में बोल रहे थे- ‘आखिर ममता बनर्जी को राम से चिढ़ क्यों है? जिसने भी श्रीराम से टकराने की जुर्रत की, उसकी दुर्गति हुई, ममता दीदी की भी दुर्गति हो चुकी है।’ ऐसी लाइनों पर भीड़ खूब तालियां मारती है। TMC के नेता अभिजीत कर्मोकार कहते हैं- ‘थोड़ी देर के लिए भले आपको इन तालियों की गूंज में ममता सरकार की मां कैंटीन, रूपश्री, कन्याश्री, चोखेर आलो, स्वास्थ्य साथी, स्कूली बच्चों को टैब, साइकिल-पोशाक योजना, कोरोना काल में लोगों को दी गई मदद आदि बातें डूबती दिखें, लेकिन यह सब लोगों के दिलों तक उतरी हुई हैं।’ सायन गुप्ता के अनुसार, भाजपा हवा बनाने की बड़ी कारीगर है, बनाई हुई भी है मगर अंतत: सबकुछ फिस्स हो जाएगा।

चाय बागान के मजदूरों में आदिवासियों की खासी तादाद है। इनको अपना बनाने की जिम्मेदारी भाजपा के अनुसूचित जाति-जनजाति समुदाय के नेताओं के पास है। ये सब अपनों (आदिवासियों) को बता रहे कि नरेंद्र मोदी सरकार ने आपके लिए क्या-क्या किया; कैसे पहली बार जनजाति मंत्रालय बना और इसके बजट को कितना ज्यादा बढ़ाया गया? और यह भी कि आपके लिए ‘अच्छे दिन’ बस आ गए हैं।

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