अभियोजन पक्ष में पेटेंट की अनुपस्थिति, अंतर्निहित दुर्बलता या अक्षमता अभियोजन के मामले में झूठ की अप्रतिरोध्यता की ओर जाता है। आपराधिक मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला देते हुए न्यायाधीश संदीप शर्मा ने यह व्यवस्था दी। न्यायाधीश शर्मा ने अपने निर्णय में कहा कि सिर्फ और सिर्फ फॉरेंसिक रिपोर्ट के आधार पर ही सजा नहीं दी जा सकती जब अभियोजन पक्ष के पास कोई और पुख्ता सबूत न हो।

अदालत ने कहा कि फॉरेंसिक साक्ष्य सिर्फ गवाहों द्वारा दी गई गवाही की सच्चाई जताने के लिए प्रयोग किए जाते हैं। पोक्सो अधिनियम के तहत निचली अदालत द्वारा सात वर्ष के सजायाफ्ता कांगड़ा निवासी संजीव कुमार की सजा को निरस्त करते हुए न्यायाधीश संदीप शर्मा ने उक्त व्यवस्था दी। मामले के अनुसार दोषी संजीव कुमार के खिलाफ  पुलिस ने भारतीय दंड संहिता कि धारा 342, 376, 120बी और पोक्सो अधिनियम की धारा 4 तथा 17 के तहत मामला दर्ज किया था।

अभियोजन पक्ष द्वारा संजीव कुमार के खिलाफ अभियोग साबित करने के लिए निचली अदालत के समक्ष मामला चलाया गया। अभियोजन पक्ष ने संजीव कुमार के खिलाफ अभियोग साबित करने के लिए कुल 26 गवाहों के बयान दर्ज किये। गवाहों के बयान और फॉरेंसिक रिपोर्ट के आधार पर निचली अदालत ने संजीव कुमार को सात वर्ष का कठोर कारावास और पचास हजार जुर्माने की सजा सुनाई।

दोषी ने निचली अदालत के इस निर्णय को अपील के माध्यम से हाईकोर्ट के समक्ष चुनौती दी। हाईकोर्ट ने मामले से जुड़े तमाम रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद पाया कि अभियोजन पक्ष संजीव कुमार के खिलाफ अभियोग साबित करने में सफल नहीं रहा है। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष को मजबूत करने वाले गवाहों ने अभियोजन पक्ष में गवाही नहीं दी है।

अदालत ने अफसोस जताया कि जब अभियोजन पक्ष के गवाह दोषी के खिलाफ गवाही नहीं दे रहे हैं तो उस स्थिति में निचली अदालत द्वारा फॉरेंसिक रिपोर्ट के आधार पर ही दोषी को सजा देना उचित नहीं है। अदालत ने पाया कि पीड़िता ने भी दोषी द्वारा उसके साथ की गई वारदात की शिनाख्त नहीं की। न्यायाधीश संदीप शर्मा ने मामले से जुड़े सभी साक्ष्यों और गवाहों के बयान का अवलोकन करने के बाद निचली अदालत द्वारा सुनाये गए निर्णय को खारिज कर दिया।

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