हम वोट देते हैं, ताकि हर सुविधाएं मिले, लेकिन वोट के बाद नेता सब वादे भूल जाते हैं- आखिर क्यों?

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जब मुझे वोट का आधिकार मिला, मुझे बहुत उत्सुकता थी मैं भी अपनी पसंद का नेता चुन सकता हूँ, मन ही मन बहुत खुश हुआ। आज 50 साल की उम्र होने वाली है, लगभग मैने अब तक शायद 6 बार अपना मत पंचायत, विधान सभा और लोकसभा के लिए दिये होंगे और बीच में और भी दिये होगे। देश विकास में मेरा योगदान बना शायद स्वर्गीय राजीव गांधी के बाद मैं मत का प्रयोग कर रहा हूँ। देश में कई सरकारे आई और गई, सबकी योजनाए गरीबों के लिए पहले बनाई जाती है। लेकिन गरीबी कभी हटी ही नहीं ?

फिर योजनाए किसानों के लिए होती किसान आज तक भी
आत्महत्या कर रहे? फिर योजनाए कर्मचारियों के लिए होती, कर्मचारी आज बिना पेंशन के घर लौट रहे है? फिर योजनाए स्कूलों-कॉलेजो के लिए होती, लेकिन शिक्षा का स्तर आज भी बेहतर नहीं बना? फिर योजनाए होती स्वास्थ्य के लिए, लेकिन स्वास्थ्य में कोई कदम आज तक नहीं ? पिछली सरकारों के योजनाए थोड़ी बहुत याद है उसे आप सब के समक्ष रखता हूँ।

1. पोलियो मुक्त भारत 19. मनरेगा 6000करोड़ रोजगार
2. सूचना का अधिकार 20. 2 करोड़ परिवार को घर
3. शिक्षा का आधिकार 21. लाखों आंगनबाड़ी का निर्माण
4. भूमि अधिग्रहण बिल 22. कुपोषित बच्चों को आहार
5. भोजन का आधिकार 23. निशुल्क छात्र छात्रवृति
6. चंद्रयान पर तिरंगा 24. आदिवासियो को भूमि के पट्टे
7. मेट्रो शहर 10 25. शहरो में 26लाख kmग्रामीण सड़के
8. परमाणु पनडुब्बी 26. 80km नया हाईवे
9. तेजस लड़ाकू विमान 27. 20हजार km नया रेल लाईन
10. अग्नि मिसाइल 28. किसानों को फसल बीमा बोनस
11. परमाणु मिसाइल 29. 2लाख नये शिक्षा संस्थान
12. आंतरिक में ऐरो ड्रम 30. 7लाख नये ऐम्म्स
13. मोबाईल और इंटरनेट 31. 90करोड़ आधार कार्ड
14. किसान कर्ज माफी 32. 8करोड़ नये गैस उपभोक्ता
15. विधवा पेंशन 33. 14लाख गाँव में बिजली
16. मजदूर पेंशन 34. 80करोड़ मुफ्त बिजली
17. कृषि क्रेडिड कार्ड 34. 72करोड़ मोबाईल उपभोक्ता
18. मिड डे मिल 36. 37 करोड़ नये बैंक खाते
…….,……………37. 65करोड़ 2रुपए गेहूं

इन सब योजनाओ में मेरी भी भागीदारी रही है, देश में बहेतर शासन के लिए हमनें बहेतर नेता चुने होंगें। वो दौर और आज का दौर में जमीन आसमा का अंतर है। देश में तब भी पेट्रोल डीजल के रेट बढ़े। लेकिन खाद्य सामग्री में इतना रेट नहीं बढ़े, मनमोहन सरकार तक शायद महंगाई कुछ हद तक कंट्रोल रही।
पेट्रोल तब शायद -67/-आज 100
गैस तब शायद -400/-आज 900
सरसों तेल तब -80/-आज 200

माना अंतर्राष्टीय बाजारों के कारण हमें महंगाई की मार झेलना पड़ रहा नाकामी तो शायद सरकार की भी दिखती है, सरकार के पास टेक्स के बहुत साधन जुट गये है। सरकारी कर्मचारियो के पेंशन बंद हो गये हैं, सभी विभाग अब प्राइवेट को दिये जा रहे है, फिर भी महंगाई पर लगाम क्यों नहीं। अगर महंगाई जनसंख्या बढ़ने से हो रही है तो सरकार अभी बहुमत में है, जनसंख्या बिल लाती क्यों नहीं। नेताओं के फालतू सुविधाएं कम करने से भी महंगाई में लगाम लगा सकते है।

मुझे इतना तो पता है, अगले चुनाव आते आते तक महंगाई सामान्य होगी। सब सस्ते होंगें, कारण सब आप लोगों को पता है जैसे ही चुनाव जीत कर सत्ता में आते है। फिर महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार होगा। ये हमारे देश के नियम बन गये है, कब किसे सस्ता करना है, कब किसे महंगा। हमें तो बस वोट ही देते रहना है, हमारी सुनेगा भी कौन? इंसान को रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य और शिक्षा चाहिए, जो बहेतर हो। अगर यही हमारे लिए बहेतर ना हो, हमारा वोट सही जगह नहीं गया। असल में महगाई के जिम्मेदार ही हम है, जो हम वोट देते आए है। वोट हमारा आधिकार है तो सभी कहते है, लेकिन हमारा वोट क्या सही जगह जाता है। अगर सही जगह जा रहा होता तो हम आज भी महगाई से क्यों जूझ रहे, क्यों बेरोजगारी से जूझ रहे। ऐसे कई सवाल आप सबके मन में भी होगे, हमारे मन में भी लेकिन क्या करें, मत का प्रयोग करते रहो और सहते रहो। अब तो आदत हो गई है। महंगाई बेरोजगारी और भ्रष्टाचार को सहते रहने की।

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