Lucknow News: उत्तर प्रदेश सरकार ने एक बड़े फैसले में राज्य में जाति-आधारित राजनीतिक रैलियों और सार्वजनिक प्रदर्शनों पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। यह कदम इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक आदेश के अनुपालन में उठाया गया है। सरकार का मानना है कि ऐसे आयोजन सार्वजनिक व्यवर्था और राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा पैदा करते हैं।
कार्यवाहक मुख्य सचिव दीपक कुमार ने रविवार की रात यह आदेश जारी किया। इस आदेश को राज्य के सभी जिलाधिकारियों, पुलिस प्रमुखों और अधिकारियों को भेजा गया है। आदेश में कहा गया है कि जाति के नाम पर की जाने वाली सभाएं समाज में तनाव और संघर्ष को बढ़ावा देती हैं।
सरकार के दस सूत्रीय आदेश में कई अहम निर्देश शामिल हैं। अब पुलिस की एफआईआर या गिरफ्तारी मेमो में किसी व्यक्ति की जाति का उल्लेख नहीं किया जाएगा। इसके बजाय माता-पिता का नाम दर्ज किया जाएगा। थानों के नोटिस बोर्ड से जाति वाला कॉलम हटाने का भी निर्देश दिया गया है।
सार्वजनिक वाहनों और साइनबोर्ड्स पर लगे जाति सूचक नारों और चिह्नों को भी हटाया जाएगा। सोशल मीडिया पर जातिगत घृणा फैलाने वाली सामग्री पर सख्त निगरानी रखी जाएगी। इसके लिए सूचना प्रौद्योगिकी नियमों के तहत कार्रवाई की जाएगी।
हालांकि, एससी-एसटी एक्ट के मामलों में इस आदेश से छूट रहेगी। इन मामलों में जाति का उल्लेख किया जा सकता है। आदेश के पालन को सुनिश्चित करने के लिए पुलिस नियमावली और मानक संचालन प्रक्रिया में भी बदलाव किए जाएंगे।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 16 सितंबर को यह महत्वपूर्ण आदेश दिया था। कोर्ट ने सरकार से केंद्रीय मोटर वाहन नियमों में संशोधन करने को कहा था। इसका उद्देश्य वाहनों पर जाति सूचक चिह्नों पर पाबंदी लगाना था। कोर्ट ने पुलिस स्टेशनों पर जाति का कॉलम हटाने का भी निर्देश दिया था।
यह फैसला जाति आधारित राजनीति करने वाली क्षेत्रीय पार्टियों के लिए एक बड़ा झटका है। निषाद पार्टी, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी और अपना दल जैसे दलों की रणनीति पर इसका सीधा असर पड़ेगा। चुनाव से पहले ये पार्टियां अक्सर जातिगत सभाएं करती हैं।
2027 के विधानसभा चुनावों को देखते हुए यह कदम और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। राजनीतिक दल पहले ही जाति आधारित प्रचार शुरू कर चुके हैं। इस प्रतिबंध के बाद उन्हें अपनी रणनीति में बदलाव करना होगा।
मामले पर समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने सवाल उठाए हैं। उन्होंने सरकार के इस कदम पर प्रतिक्रिया दी है। हालांकि सरकार का मानना है कि यह आदेश सामाजिक सद्भाव और कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए जरूरी है।
यह आदेश उत्तर प्रदेश में सामाजिक समरसता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे जातिगत संघर्ष और तनाव को कम करने में मदद मिलने की उम्मीद है। सरकार का लक्ष्य एक समावेशी और समान समाज का निर्माण करना है।

