National News: केंद्र सरकार ने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में दो नए अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किए हैं। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने हरियाणा के जिला एवं सत्र न्यायाधीश रमेश चंद्र डिमरी और नीरजा कुलवंत कलसन की नियुक्ति को मंजूरी दी। इस नियुक्ति से हाई कोर्ट में कार्यरत न्यायाधीशों की संख्या बढ़कर 61 हो गई है।
सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिश पर हुई नियुक्ति
कानून एवं न्याय मंत्रालय के न्याय विभाग ने शुक्रवार को इस संबंध में अधिसूचना जारी की। यह नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिश पर हुई है। कॉलेजियम ने पिछले वर्ष 16 दिसंबर को इन दोनों नामों की सिफारिश केंद्र सरकार से की थी। इस तरह की नियुक्ति प्रक्रिया में कई स्तरों पर मंजूरी की आवश्यकता होती है।
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में कुल स्वीकृत पदों की संख्या 85 है। नियुक्ति से पहले यहां केवल 59 न्यायाधीश कार्यरत थे। दो नए न्यायाधीशों के आने से कार्यरत जजों की संख्या 61 तक पहुंच गई है। अब भी कोर्ट में 24 पद खाली हैं। यह खाली पद न्यायिक प्रणाली पर दबाव का एक बड़ा कारण हैं।
लंबित मामलों के निपटारे में मिलेगी तेजी
इन नियुक्तियों से हाई कोर्ट में लंबित मामलों के निपटारे में तेजी आने की उम्मीद है। राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड के अनुसार इस हाई कोर्ट में इस समय लगभग साढ़े चार लाख मामले लंबित हैं। वर्तमान में लंबित मामलों की संख्या 4,20,880 दर्ज की गई है। यह संख्या पिछले वर्ष जनवरी में दर्ज लंबित मामलों से कम है।
जनवरी 2025 में इस हाई कोर्ट में 4,32,227 मामले लंबित थे। इस तरह एक वर्ष में लंबित मामलों में 11,347 की कमी आई है। नए न्यायाधीशों के आने से मामलों के निपटान की गति और बढ़ सकती है। यह न्याय प्रणाली की कार्यक्षमता के लिए एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है।
न्यायाधीश नियुक्ति की जटिल प्रक्रिया
हाई कोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति एक लंबी और जटिल प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में कई स्तरों पर मंजूरी शामिल होती है। सबसे पहले राज्य सरकार और राज्यपाल की सिफारिश आवश्यक होती है। उसके बाद सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम नामों पर विचार करता है। अंत में केंद्रीय विधि मंत्रालय से मंजूरी मिलती है।
यह पूरी प्रक्रिया आमतौर पर कई महीनों तक चलती है। इस दौरान विभिन्न स्तरों पर जांच और पड़ताल होती है। इसी कारण से न्यायिक पदों को भरने में लंबी देरी हो जाती है। इस देरी का सीधा प्रभाव न्यायिक व्यवस्था के कामकाज पर पड़ता है। लंबित मामलों का बोझ लगातार बढ़ता रहता है।
न्यायिक व्यवस्था पर लगातार दबाव
खाली पदों के कारण न्यायिक व्यवस्था पर लगातार दबाव बना हुआ है। प्रत्येक न्यायाधीश के सामने मामलों का बहुत बड़ा बोझ रहता है। इससे मामलों का निपटारा समय पर नहीं हो पाता है। नागरिकों को न्याय पाने में अनावश्यक देरी का सामना करना पड़ता है। यह स्थिति न्याय प्रणाली की गति के लिए चुनौतीपूर्ण है।
नए न्यायाधीशों की नियुक्ति इस दबाव को कुछ हद तक कम कर सकेगी। अदालतें अधिक मामलों की सुनवाई कर पाएंगी। न्याय प्रक्रिया में तेजी आएगी। इससे आम नागरिकों को भी लाभ मिलेगा। उनके मामलों का निपटारा तेजी से हो सकेगा।
न्यायपालिका की मजबूती की दिशा में कदम
न्यायाधीशों की नियुक्ति न्यायपालिका को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे न्यायिक संस्थानों की कार्यक्षमता बढ़ेगी। न्याय तक पहुंच सुगम बनेगी। संवैधानिक मूल्यों की रक्षा में भी मदद मिलेगी। यह लोकतंत्र के लिए एक स्वस्थ संकेत है।
इन नियुक्तियों से न्यायिक प्रशासन को नया बल मिलेगा। अदालतों में कार्यवाही की गति बढ़ेगी। न्यायिक प्रक्रियाएं अधिक कुशलतापूर्वक संचालित हो सकेंगी। इस तरह की नियुक्तियां न्याय प्रणाली के समग्र विकास में सहायक सिद्ध होंगी। यह न्यायिक सुधारों की दिशा में एक सकारात्मक पहल है।

