Washington News: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी दूसरी पारी में पूरी दुनिया के लिए सिरदर्द बन गए हैं। उनके फैसलों ने ग्लोबल मार्केट में भूचाल ला दिया है। डोनाल्ड ट्रंप ने भारत और ब्राजील जैसे देशों पर भारी टैरिफ लगाकर व्यापार युद्ध छेड़ दिया है। इतना ही नहीं, वेनेजुएला के राष्ट्रपति को बंधक बनाने जैसी घटनाओं ने हर किसी को डरा दिया है। अमेरिका की इस मनमानी के खिलाफ अब दुनिया एकजुट होने लगी है। कई शक्तिशाली देश अब अमेरिकी डॉलर (Dollar) की बादशाहत को खत्म करने का प्लान बना रहे हैं।
भारत और ब्राजील पर ट्रंप का वार
डोनाल्ड ट्रंप ने शपथ लेते ही सबसे पहले टैरिफ का मुद्दा उठाया था। उन्होंने भारत पर 50 फीसदी का भारी-भरकम इंपोर्ट टैक्स लगा दिया है। वे इसे और बढ़ाने की धमकी भी दे रहे हैं। हालांकि, चीन ने जब ईंट का जवाब पत्थर से दिया, तो ट्रंप थोड़े नरम पड़ गए। लेकिन भारत और ब्राजील के लिए उनका रवैया सख्त बना हुआ है। इसके अलावा, ट्रंप ने ईरान से व्यापार करने वाले देशों पर भी 25 फीसदी टैक्स लगाने का ऐलान किया है। इससे भारत समेत कई देशों को बड़ा आर्थिक नुकसान हो रहा है।
वेनेजुएला पर कब्जा और ग्रीनलैंड पर नजर
अमेरिकी राष्ट्रपति की मनमानी की हद तब पार हो गई जब वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को बंधक बना लिया गया। अमेरिकी सेना उन्हें उठाकर अमेरिका ले आई। डोनाल्ड ट्रंप अब वेनेजुएला के विशाल तेल भंडार पर अपना हक जता रहे हैं। उनकी भूख यहीं शांत नहीं हुई है। अब वे ग्रीनलैंड पर भी कब्जा करना चाहते हैं। ट्रंप की इन हरकतों के पीछे अमेरिका की सैन्य ताकत और डॉलर का वर्चस्व है। इसी डॉलर की ताकत को अब दुनिया के बाकी देश तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।
डी-डॉलराइजेशन: अमेरिका के खिलाफ बड़ी चाल
अमेरिका दुनिया का सबसे ताकतवर देश इसलिए है क्योंकि पूरी दुनिया का व्यापार ‘डॉलर’ में होता है। इसे ‘इंटरनेशनल रिजर्व करेंसी’ कहा जाता है। लेकिन डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों से परेशान होकर देश अब ‘डी-डॉलराइजेशन’ (De-dollarization) की तरफ बढ़ रहे हैं। इसका मतलब है डॉलर को छोड़कर अपनी खुद की करेंसी में लेन-देन करना। अगर डॉलर कमजोर हुआ, तो अमेरिका की सुपरपावर वाली छवि मिट्टी में मिल जाएगी।
रूस और चीन ने डॉलर को दिखाया ठेंगा
डी-डॉलराइजेशन की शुरुआत रूस और चीन ने कर दी है। यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका ने रूस पर कई प्रतिबंध लगाए थे। इसके जवाब में रूस ने डॉलर छोड़कर रूबल (Ruble) में व्यापार शुरू कर दिया। रिपोर्ट के मुताबिक, रूस और चीन के बीच उनकी अपनी करेंसी में व्यापार 80 गुना बढ़ गया है। सऊदी अरब ने भी 2023 में ऐलान कर दिया था कि वह तेल बेचने के लिए डॉलर के अलावा दूसरी करेंसी स्वीकार करने को तैयार है। यह डोनाल्ड ट्रंप के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं है।
भारत की भूमिका और ब्रिक्स की नई करेंसी
डॉलर के खिलाफ इस लड़ाई में भारत भी अहम भूमिका निभा रहा है। भारत ने रूस के साथ रुपये और रूबल में व्यापार तेज कर दिया है। इसके अलावा भारत यूएई, इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देशों के साथ भी अपनी करेंसी में ट्रेड कर रहा है।
सबसे बड़ा खतरा ब्रिक्स (BRICS) समूह से है। इसमें भारत, रूस, चीन, ब्राजील और साउथ अफ्रीका शामिल हैं। ये देश अपनी एक नई ‘ब्रिक्स करेंसी’ लाने की योजना बना रहे हैं। ग्लोबल इकोनॉमी में ब्रिक्स की हिस्सेदारी 40 फीसदी है। अगर ये देश डॉलर का इस्तेमाल बंद कर दें, तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था हिल जाएगी। यही वजह है कि डोनाल्ड ट्रंप ब्रिक्स देशों को धमकियां दे रहे हैं।
