World News: अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यूक्रेन के खिलाफ चल रहे युद्ध में रूस की मदद करने के आरोप में दो प्रमुख रूसी तेल कंपनियों पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है। इसे ट्रंप प्रशासन द्वारा अब तक की गई सबसे बड़ी कार्रवाई माना जा रहा है। यह पहला मौका है जब उन्होंने सीधे तौर पर रूस पर आर्थिक दबाव बनाने का फैसला किया है। विश्लेषकों का मानना है कि तेल को हथियार के रूप में इस्तेमाल कर यूक्रेन संकट में शांति की मध्यस्थता की कोशिश की जा सकती है।
इतिहास में तेल की कीमतों ने वैश्विक राजनीति को प्रभावित करने में अहम भूमिका निभाई है। सोवियत संघ के दौरान 1970 और 1980 के दशक में तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव ने आर्थिक हालात पर गहरा असर डाला था। 1973-74 और फिर 1978-80 में तेल कीमतों में वृद्धि ने अमेरिका और पश्चिमी यूरोप में महंगाई को बढ़ावा दिया था। इन देशों को आर्थिक मंदी और बेरोजगारी से जूझना पड़ रहा था।
वहीं दूसरी ओर सोवियत संघ को तेल निर्यात से होने वाली आय का फायदा मिल रहा था। इस आय ने न केवल उसकी अर्थव्यवस्था को स्थिर रखा बल्कि सैन्य और औद्योगिक ढांचे को भी मजबूत किया। सोवियत संघ ने इस दौरान अफ्रीका और एशिया में अपने प्रभाव का विस्तार किया था। हथियारों की होड़ में उसने अपनी स्थिति मजबूत की।
योम किप्पुर युद्ध और तेल संकट
अक्टूबर 1973 में मिस्र और सीरिया के नेतृत्व वाले अरब गठबंधन ने इजराइल पर हमला किया था। इस युद्ध में सोवियत संघ ने अरब देशों का समर्थन किया जबकि अमेरिका ने इजराइल का। जवाब में अरब देशों ने तेल की आपूर्ति कम कर दी और अमेरिका पर प्रतिबंध लगा दिए। इस कदम ने वैश्विक तेल बाजार को हिलाकर रख दिया और कीमतों में भारी उछाल आया।
इतिहासकार डैनियल यरगिन के मुताबिक 1973 की तेल पाबंदी ने दुनिया के ऊर्जा बाजार को फिर से बदल दिया। इसने क्षेत्रीय राजनीति और वैश्विक अर्थव्यवस्था को फिर से ढाला। 1979 में मिस्र-इजराइल शांति समझौते के दौरान ईरान में क्रांति ने दूसरे तेल संकट को जन्म दिया। इन हालातों ने सोवियत संघ को तेल निर्यातक के रूप में मजबूत किया।
सोवियत संघ का उदय और पतन
1980 तक सोवियत संघ दुनिया का सबसे बड़ा तेल निर्यातक देश बन गया था। उसे साइबेरिया में तेल के विशाल भंडार मिले थे। बढ़ती कीमतों ने तेल निकालने के काम को फायदेमंद बना दिया था। सोवियत संघ ने क्यूबा और वियतनाम समेत पूर्वी यूरोपीय देशों को सस्ते दामों पर तेल की आपूर्ति की। इससे उसके इर्द-गिर्द निर्भर रहने वाले देशों का एक नेटवर्क बन गया।
पेट्रो-डॉलर की बाढ़ ने सोवियत संघ को अनाज और तकनीक का आयात करने में मदद की। लेकिन इसने उसकी आर्थिक व्यवस्था की अंदरूनी कमजोरियों को ढक दिया। अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों के संसाधन तेल उद्योग में लगने लगे। 1979 में अफगानिस्तान पर हमले के बाद अमेरिका और पश्चिमी देशों ने सोवियत तकनीक निर्यात पर पाबंदी लगा दी।
तेल कीमतों में गिरावट का असर
1980 के दशक की शुरुआत में वैश्विक तेल मांग घटने लगी और कीमतें गिर गईं। सोवियत संघ को अपनी बजटीय जरूरतों को पूरा करने के लिए कर्ज लेना पड़ा। 1980 से 1986 के बीच तेल की कीमत 35 डॉलर प्रति बैरल से गिरकर 10-15 डॉलर पर आ गई। पश्चिमी देशों ने ऊर्जा संरक्षण और घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर ध्यान दिया।
यूक्रेन के राष्ट्रपति कार्यालय प्रमुख आंद्रेई यरमक के मुताबिक 1986 में अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन और सऊदी अरब के शाह फहद ने तेल कीमतें कम करने की योजना बनाई। सऊदी अरब ने ओपेक को उत्पादन बढ़ाने के लिए राजी किया। अमेरिका ने भी अपना उत्पादन बढ़ाया। इसका सोवियत अर्थव्यवस्था पर विनाशकारी असर पड़ा।
आधुनिक रूस पर तेल की निर्भरता
सोवियत संघ के विपरीत आधुनिक रूस की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से ऊर्जा निर्यात पर निर्भर है। हाल के वर्षों में तेल और गैस का रूसी निर्यात में 60 फीसदी और सरकारी राजस्व में 40 फीसदी हिस्सा रहा है। पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद चीन और भारत जैसे देश रूस से तेल खरीद रहे हैं। तुर्की भी रूसी तेल का प्रमुख ग्राहक बना हुआ है।
रूस तेल निर्यात से होने वाली आय को यूक्रेन युद्ध के वित्तपोषण के लिए इस्तेमाल कर रहा है। ट्रंप के प्रतिबंधों ने वैश्विक तेल कीमतों को बढ़ा दिया है। ब्रेंट क्रूड की कीमत में पांच फीसदी का उछाल आया है। हालांकि रूसी कच्चा तेल यूराल्स ब्रेंट से सस्ता है। प्रतिबंधों के चलते खरीदारों के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
इस बीच यूक्रेन द्वारा रूसी तेल रिफाइनरियों और ऊर्जा ढांचे पर हमले तेज हो गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक रूसी अर्थव्यवस्था सोवियत दौर से अलग है। यूक्रेन युद्ध से पहले रूसी अर्थव्यवस्था मजबूत स्थिति में थी। तेल कीमतों में गिरावट का रूस पर क्या असर होगा यह भविष्य के गर्भ में छिपा हुआ है।

