New Delhi: राज्यसभा एक स्थायी सदन है और यह कभी भंग नहीं होता। यही कारण है कि लोकसभा के विपरीत, यहाँ पेश किए गए बिल सदन भंग होने पर खत्म नहीं होते। वर्तमान में उच्च सदन में कुल 19 बिल पेंडिंग हैं। हैरानी की बात यह है कि इनमें सबसे पुराना बिल साल 1992 का है। यह बिल जनसंख्या नियंत्रण और नेताओं के लिए ‘दो बच्चों’ के नियम से जुड़ा है। संसद के एक हालिया बुलेटिन में इन अटके हुए विधेयकों की जानकारी दी गई है।
जनसंख्या नियंत्रण और नेताओं पर सख्ती
राज्यसभा में सबसे लंबा इंतजार ‘संविधान (79वां संशोधन) विधेयक, 1992’ कर रहा है। इस बिल में राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों में बदलाव का प्रस्ताव था। इसका उद्देश्य जनसंख्या नियंत्रण और छोटे परिवार के नियमों को बढ़ावा देना था। बिल में प्रस्ताव था कि छोटे परिवार को अपनाना मौलिक कर्तव्यों में शामिल हो। सबसे अहम बात यह थी कि जिस सांसद या विधायक के दो से ज्यादा बच्चे हों, उसे अयोग्य घोषित करने का प्रावधान भी इसमें शामिल था।
किराया कानून और बीज बिल भी कतार में
पेंडिंग लिस्ट में ‘दिल्ली किराया (संशोधन) बिल, 1997’ भी शामिल है। इसे दिल्ली किराया अधिनियम 1995 में सुधार के लिए लाया गया था। इसका मकसद कानूनों को मॉडर्न बनाना था, लेकिन मकान मालिकों और किरायेदारों के विरोध के कारण यह अटक गया। इसके अलावा ‘बीज बिल, 2004’ भी पेंडिंग है। इसका काम बीजों की क्वालिटी और सप्लाई को आसान बनाना था। दिलचस्प बात यह है कि सरकार अब नया ‘बीज बिल 2025’ लाने पर काम कर रही है।
मनमोहन सरकार के समय के बिल
यूपीए सरकार के कई बिल आज भी राज्यसभा में लंबित हैं। साल 2011 में जब मल्लिकार्जुन खरगे श्रम मंत्री थे, तब उन्होंने ‘अंतर-राज्य प्रवासी कामगार संशोधन बिल’ पेश किया था। यह अभी तक पास नहीं हुआ है। इसके अलावा, यूपीए-2 के दौरान 2013 में पेश किए गए निर्माण मजदूरों और रोजगार कार्यालय से जुड़े बिल भी पेंडिंग हैं। अनुसूचित जातियों और जनजातियों के प्रतिनिधित्व से जुड़ा 2013 का एक बिल भी इसी सूची में है।
मोदी सरकार के अटके हुए विधेयक
मौजूदा एनडीए सरकार के दौरान पेश किए गए कुछ बिल भी अभी कानून नहीं बन पाए हैं। इनमें ‘संविधान (125वां संशोधन) बिल, 2019’ प्रमुख है। यह बिल पूर्वोत्तर भारत (असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम) में आदिवासी स्वायत्तता को मजबूत करने के लिए लाया गया था। इसमें गांव और म्युनिसिपल काउंसिल को ज्यादा वित्तीय ताकत देने की बात थी। साथ ही, एनआरआई (NRI) की शादियों के रजिस्ट्रेशन को अनिवार्य बनाने वाला 2019 का बिल भी अभी कतार में है।
