International News: दुनिया इस वक्त बारूद के ढेर पर बैठी है। यूक्रेन-रूस युद्ध हो या इजरायल-हमास संघर्ष, हर जगह तनाव चरम पर है। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र (UN) जैसे संस्थान बेअसर साबित हो रहे हैं। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने दुनिया के मौजूदा हालात पर गहरी चिंता जताई है। उन्होंने माना कि वैश्विक व्यवस्था अब ‘जंगलराज’ की ओर बढ़ रही है। मैक्रों का यह बयान सीधे तौर पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस चेतावनी को सही साबित करता है, जो वे पिछले 10 सालों से दुनिया को दे रहे हैं।
जिसकी लाठी उसकी भैंस का दौर
राष्ट्रपति मैक्रों ने एलिसी पैलेस में अपने राजदूतों से बात करते हुए कड़े शब्दों का प्रयोग किया। उन्होंने साफ कहा कि दुनिया अब ‘शक्तिशाली के कानून’ (Law of the strongest) पर वापस लौट रही है। इसका मतलब है कि जिसके पास ताकत है, वही नियम बनाएगा। मैक्रों ने डर जताया कि यह चलन खतरनाक है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या कल को ग्रीनलैंड पर हमला होगा? क्या कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बनने का दबाव झेलना पड़ेगा? या फिर ताइवान को पूरी तरह घेर लिया जाएगा? यह स्थिति छोटे देशों के लिए अस्तित्व का संकट बन गई है।
अमेरिका की विस्तारवादी सोच पर निशाना
मैक्रों का इशारा अमेरिका के ट्रंप प्रशासन की तरफ था। अमेरिका ने हाल ही में खनिज संसाधनों से भरे ग्रीनलैंड पर अपना अधिकार जमाना चाहा है। यहां तक कि इसके लिए सैन्य विकल्प की बातें भी हो रही हैं। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने तो यह भी कह दिया कि डेनमार्क ग्रीनलैंड की सुरक्षा नहीं कर सकता। उनका कहना है कि अमेरिका अपने फायदे के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। यह बयान दिखाता है कि महाशक्तियां अब नियमों की परवाह नहीं कर रही हैं।
संयुक्त राष्ट्र बना ‘मूक दर्शक’
फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने स्वीकार किया कि वैश्विक बहुपक्षवाद अब काम नहीं कर रहा है। दुनिया निष्क्रिय होती जा रही है। यह सीधे तौर पर संयुक्त राष्ट्र की नाकामी है। जब ताकतवर देश ग्रीनलैंड या ताइवान जैसे संप्रभु राष्ट्रों को डराते हैं, तो UN चुपचाप तमाशा देखता है। मैक्रों ने इसे ‘नियो-कोलोनियल’ यानी नया उपनिवेशवाद कहा है। ताकतवर देश अपनी सेना और पैसे के दम पर दूसरों की जमीन हड़पना चाहते हैं। जो देश नियम बनाते थे, आज वही उन्हें तोड़ रहे हैं।
पीएम मोदी ने 10 साल पहले दी थी चेतावनी
जो बात आज फ्रांस और पश्चिमी देशों को समझ आ रही है, उसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक दशक से समझा रहे हैं। साल 2014 से ही पीएम मोदी ‘सुधरे हुए बहुपक्षवाद’ (Reformed Multilateralism) की मांग कर रहे हैं। नरेंद्र मोदी ने कई बार कहा है कि संयुक्त राष्ट्र 1945 की पुरानी सोच में फंसा है। अगर यह समय के साथ नहीं बदला, तो यह सिर्फ बातों की दुकान (Talking Shop) बनकर रह जाएगा।
भारत बना दुनिया का सच्चा मित्र
भारत ने हमेशा विकासशील देशों की आवाज उठाई है। नरेंद्र मोदी का कहना है कि दुनिया मुट्ठी भर देशों की मर्जी से नहीं चल सकती। आज मैक्रों का यह कहना कि ‘हमें UN में फिर से जान फूंकनी चाहिए’, दरअसल भारत के एजेंडे की ही जीत है। जहां अमेरिका और अन्य देश ‘विस्तारवाद’ में लगे हैं, वहीं भारत ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की बात करता है। भारत एक ऐसी दुनिया चाहता है जो नियमों पर चले, न कि किसी की दादागिरी पर।

