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दरभंगा राज का वो योद्धा, जिसने गांधीजी से पहले ही अंग्रेजों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया

Darbhanga News: दरभंगा राज की आखिरी महारानी कामसुंदरी देवी के निधन के साथ ही एक गौरवशाली युग का अंत हो गया है. महारानी के जाने के बाद राजघराने के इतिहास की चर्चा फिर से शुरू हो गई है. इस राजवंश के इतिहास में महाराज माधव सिंह का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया है. माधव सिंह ने अपनी कूटनीति से दरभंगा राज की डूबती नैया को पार लगाया था. आपको जानकर हैरानी होगी कि उन्होंने गांधीजी के आंदोलनों से करीब 125 साल पहले ही अंग्रेजों के खिलाफ ‘असहयोग’ जैसे हथियारों का सफल प्रयोग किया था और अपने राज्य को बचाया था.

महारानी का निधन और अंतिम संस्कार

बीते सोमवार को दरभंगा राज की आखिरी महारानी कामसुंदरी देवी का 94 वर्ष की आयु में निधन हो गया. उनके निधन के बाद अंतिम संस्कार के दौरान कुछ विवाद की स्थिति बन गई थी. हालांकि, बिहार सरकार के मंत्री और स्थानीय प्रशासन ने मामले को संभाला. इसके बाद महारानी का दाह-संस्कार संपन्न हुआ. वह अपने पीछे एक भारी भरकम इतिहास छोड़ गई हैं.

अंग्रेजों से ऐसे बचाई अपनी रियासत

ऐतिहासिक रूप से मिथिला को तिरहुत कहा जाता था. मुगल काल तक यह एक स्वतंत्र राज्य था. 1765 में ईस्ट इंडिया कंपनी को बिहार, बंगाल और उड़ीसा का अधिकार मिल गया. इसके बाद तिरहुत की आजादी पर खतरा मंडराने लगा. कंपनी ने राजा प्रताप सिंह से उनका राज्य छीन लिया. 1775 में जब माधव सिंह ने दरभंगा राज की गद्दी संभाली, तो उन्होंने तलवार की जगह दिमाग का इस्तेमाल किया. उन्होंने मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय से फरमान हासिल किया और अंग्रेजों के दावों को कड़ी चुनौती दी.

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गांधीजी से पहले शुरू किया असहयोग

अंग्रेजों और माधव सिंह के बीच असली लड़ाई 1793 में शुरू हुई. अंग्रेज अधिकारी ने स्थाई बंदोबस्त का प्रस्ताव रखा, जिसे माधव सिंह ने ठुकरा दिया. इसके बाद कंपनी ने दरभंगा राज की जिम्मेदारी बाहरी लोगों को सौंप दी. यहीं से माधव सिंह ने अपनी ‘असहयोग नीति’ शुरू की. उन्होंने ऐसी बिसात बिछाई कि नए जमींदार लगान वसूलने में पूरी तरह फेल हो गए. उन्होंने अंग्रेजों की सत्ता को चुनौती दिए बिना पूरी व्यवस्था ठप कर दी. आखिरकार 1800 ईस्वी में ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा. उन्हें माधव सिंह की शर्तों पर ही जमींदारी वापस लौटानी पड़ी.

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प्रशासनिक स्तर पर भी अंग्रेजों को दी मात

इतिहासकार डॉ. शंकर देव झा के मुताबिक, माधव सिंह ने प्रशासन में भी अंग्रेजों को धूल चटा दी थी. जब अंग्रेजों ने दरभंगा को अपना मुख्यालय बनाया, तो माधव सिंह ने इसका कड़ा विरोध किया. उन्होंने साफ कह दिया कि “एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं.” उनके इस विरोध के कारण अंग्रेजों को अपना मुख्यालय मुजफ्फरपुर ले जाना पड़ा. उन्होंने दरभंगा राज की न्याय व्यवस्था को भी स्वतंत्र रखा. 1794 में उनके द्वारा संस्कृत में दिया गया फैसला आज भी भारतीय न्याय प्रणाली का अहम दस्तावेज माना जाता है.

वारिस और संपत्ति का विवाद

दरभंगा राज के आखिरी राजा कामेश्वर सिंह ने तीन शादियां की थीं, लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी. उनके निधन के बाद तीसरी पत्नी कामसुंदरी देवी ने अपनी बड़ी बेटी के बेटे कुमार कपिलेश्वर को ट्रस्टी बनाया था. फिलहाल कपिलेश्वर ही घोषित वारिस हैं. हालांकि, राजा कामेश्वर सिंह द्वारा बनाए गए पुराने ट्रस्टियों को लेकर संपत्ति का विवाद आज भी चल रहा है.

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