राजतिलक की परंपरा अलोकतांत्रिक और वास्तिविक : पूर्व डीजीपी आईडी भंडारी

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देश को आजाद हुए लगभग 74 साल हो गए है। लेकिन आज तक देश से अलोकतांत्रिक परमपराओं का उन्मूलन पूरी तरह से नही हो पाया। भले ही देश को 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू कर लोकतांत्रिक घोषित कर दिया गया हो। लेकिन फिर भी देश में अलोकतांत्रिक घटनाओं के घटित होने में कोई कमी नही है। ऐसा ही मामला हाल में ही हिमाचल प्रदेश से निकल कर आया है जहां संविधान और लोकतंत्र को दरकिनार करते हुए पर्दों के पीछे ही सही लेकिन लोकतंत्र की हत्या की गई। रामपुर बुशहर का नया राजा बनाया गया, जबकि यह कतई संविधान का विरोध या उल्लंघन है।

इस मामले पर हिमाचल के पूर्व डीजीपी आईडी भंडारी ने जबरदस्त टिप्पणी की है और उन्होंने राज्यभिषेक की परम्पराओं पर सवाल उठाए है। पिछले दिनों रामपुर में वीरभद्र सिंह के अंतिम संस्कार से पहले विक्रमादित्य सिंह के राज्याभिषेक की परंपरा निभाई गई। पूर्व डीजीपी ने इस प्रथा को कानून और लोकतांत्रिक परंपराओं के खिलाफ करार दिया है।

पूर्व डीजीपी ने अपने फेसबुक पोस्ट में एक पेज का स्क्रीनशॉट भी अटैच किया है, जिसमें विक्रमादित्य की तस्वीर में लिखा है, “123वें शासक राजा विक्रमादित्य सिंह रामपुर बुशहर रियासत के लिए।” इस पोस्ट में ईश्वर देव भंडारी ने लिखा है, “ये क्या हो रहा है? विरासत सौंपना एक बात है और एक रियासत का प्रतिनिधि घोषित करना दूसरी बात है। उन्होंने लिखा, “हमारे माननीय वीरभद्र सिंह के निधन पर दूसरों की तरह दुखी हूं। मैं उसका बहुत सम्मान करता था। लेकिन एक लोकतांत्रिक देश का नागरिक होने के नाते, मैं मध्य युग की तरह एक राजा के रूप में ताज पहनाए जाने को नहीं समझ सकता। पूर्व डीजीपी ने लिखा, ‘काश हम गुलामी की मानसिकता का समर्थन करने की बजाय लोकतांत्रिक परंपराओं का पालन करें और उन पर गर्व करें। शायद मैं गलत हूं क्योंकि लोकतंत्र और कानून में मेरा दृढ़ विश्वास है। लेकिन मुझे उन लोगों के लिए खेद है जो इस तरह की अतार्किक और अवास्तविक परंपराओं का समर्थन कर रहे हैं।” अंत में वे लिखते हैं, “क्षमा करें, इतिहास की गलत बातों का हमारे भविष्य में कोई स्थान नहीं होना चाहिए।”

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