Delhi News: सुप्रीम कोर्ट ने कक्षा 8 की एनसीईआरटी (NCERT) की सोशल साइंस की किताब में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ नामक अध्याय पर कड़ी नाराजगी जताई है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने इस मामले पर स्वतः संज्ञान लेते हुए किताब पर तत्काल प्रतिबंध लगाने का निर्देश दिया है। अदालत ने इसे न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंचाने और संस्थागत अधिकार को कमजोर करने की एक ‘सुनियोजित साजिश’ करार दिया है। कोर्ट ने आदेश दिया है कि इस किताब की सभी डिजिटल और हार्ड कॉपियां तुरंत बाजार और स्कूलों से वापस ली जाएं।
अदालत की सख्त टिप्पणी और भविष्य का खतरा
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि यह पाठ्य सामग्री केवल विद्यार्थियों तक सीमित नहीं रहती है। यह शिक्षकों से होते हुए अभिभावकों और पूरी अगली पीढ़ी तक पहुंचती है। अदालत के अनुसार, इस चैप्टर में न्यायपालिका के गौरवशाली इतिहास को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया है। जजों ने कहा कि अगर इसे ऐसे ही छोड़ दिया गया, तो न्यायपालिका में जनता का विश्वास कम हो जाएगा। कोर्ट ने साफ किया कि किसी को भी न्यायपालिका को बदनाम करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
प्रतियों को जब्त करने और शपथपत्र देने का आदेश
अदालत ने एनसीईआरटी के निदेशक और स्कूल प्रिंसिपलों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं। केंद्र और राज्य शिक्षा विभागों के समन्वय से यह सुनिश्चित करना होगा कि स्टॉक में मौजूद या दुकानों पर बिक रही सभी किताबें जब्त की जाएं। संबंधित अधिकारियों को इस आदेश के पालन के संबंध में अदालत में शपथपत्र भी जमा करना होगा। कोर्ट ने एनसीईआरटी को ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी कर पूछा है कि उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई क्यों न की जाए।
NCERT की माफी पर कोर्ट का रुख
विवाद बढ़ने के बाद एनसीईआरटी ने एक प्रेस नोट जारी कर माफी मांगी थी। बोर्ड ने स्वीकार किया कि ‘एक्सप्लोरिंग सोसायटी: इंडिया एंड बियॉन्ड’ किताब में यह सामग्री अनजाने में शामिल हो गई थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस माफी पर भी सवाल उठाए हैं। अदालत अब इस बात की जांच करेगी कि यह माफी सच्ची नीयत से मांगी गई है या केवल कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए एक औपचारिकता है। मामले की अगली सुनवाई अब 11 मार्च को तय की गई है।
विवाद की जड़ और वरिष्ठ वकीलों की आपत्ति
इस पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने इसे अदालत के सामने उठाया। कपिल सिब्बल ने सवाल किया कि अगर किताब में न्यायपालिका के भ्रष्टाचार पर चैप्टर है, तो राजनेताओं और नौकरशाही के भ्रष्टाचार का जिक्र क्यों नहीं है? सोशल साइंस की इस किताब में जजों की कमी और लंबित मामलों के साथ भ्रष्टाचार को एक बड़ी चुनौती बताया गया था। कानून विशेषज्ञों ने इसे न्यायपालिका की छवि खराब करने वाला एकतरफा प्रयास बताया है।

