Festival News: लोहड़ी का त्योहार अपने साथ एक खास गीत और एक महान नायक की कहानी लेकर आता है। यह गीत है ‘सुंदर मुंदरिये हो, तेरा कौन विचारा हो… दुल्ला भट्टी वाला हो…’। इस गीत में दुल्ला भट्टी का जिक्र मिलता है। पंजाब का यह लोकपर्व इस गीत और दुल्ला भट्टी की कहानी के बिना अधूरा माना जाता है। परिक्रमा करते हुए लोग यह गीत गाते हैं।
आग में तिल और गुड़ अर्पित करते समय यह गीत गूंजता है। इसके पीछे एक ऐतिहासिक और सामाजिक कहानी छिपी है। दुल्ला भट्टी पंजाब के लोकनायक थे जिन्होंने मुगलों के जमाने में लड़कियों की रक्षा की थी। उनकी वीरता को याद करने का यह एक अनूठा तरीका है।
दुल्ला भट्टी कौन थे?
दुल्लाभट्टी पंजाब के एक विद्रोही योद्धा और लोकनायक थे। वह गरीबों और स्त्रियों के रक्षक के रूप में प्रसिद्ध हैं। उनका जन्म 16वीं शताब्दी में पंजाब के सांडल बार क्षेत्र में हुआ था। यह इलाका अब पाकिस्तान के फैसलाबाद में आता है। वह राजपूत वंश से ताल्लुक रखते थे।
उनके पिता और दादा ने भी मुगलों की नीतियों का विरोध किया था। इस कारण उन्हें सजा मिली थी। ऐसी पारिवारिक पृष्ठभूमि ने दुल्ला भट्टी के अंदर विद्रोह की भावना पैदा की। वह मुगल साम्राज्य के खिलाफ खुलकर खड़े हुए। लोग उन्हें गरीबों का मसीहा मानते थे।
लड़कियों की रक्षा की कहानी
मुगल बादशाह अकबर केशासनकाल में एक दुखद प्रथा थी। संदल बार क्षेत्र में गरीब लड़कियों को अमीर सौदागरों के हाथों बेचा जाता था। दुल्ला भट्टी ने इस प्रथा का डटकर विरोध किया। उन्होंने कई लड़कियों को सौदागरों के चंगुल से छुड़ाया। फिर उनकी शादी करवाकर सम्मानजनक जीवन दिया।
एक प्रसिद्ध कहानी सुंदरदास नाम के किसान की है। उसकी दो बेटियां सुंदरी और मुंदरी थीं। उनकी जबरदस्ती शादी कराने की तैयारी थी। दुल्ला भट्टी को इसकी खबर लगी। उन्होंने गांव में आग लगा दी और शादी रोक दी। बाद में लड़कियों की इच्छा के अनुसार उनकी शादी करवाई।
लोहड़ी गीत का संबंध
लोहड़ीपर गाया जाने वाला गीत इसी घटना से जुड़ा हुआ है। गीत में सुंदरी और मुंदरी का जिक्र है। साथ ही दुल्ला भट्टी को याद किया जाता है। गीत के बोल पूछते हैं कि इन लड़कियों का कौन विचार करेगा। जवाब में दुल्ला भट्टी का नाम लिया जाता है।
यह गीत सदियों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आ रहा है। यह सिर्फ एक त्योहार का गीत नहीं है। यह एक ऐतिहासिक घटना की याद दिलाता है। यह समाज में स्त्री सम्मान के प्रति जागरूकता का प्रतीक है। दुल्ला भट्टी की वीरता को अमर बनाने का यह एक सशक्त माध्यम है।
पंजाबी लोकसंस्कृति में महत्व
दुल्लाभट्टी पंजाबी लोकसंस्कृति के एक अहम चरित्र हैं। उनकी गाथाएं लोकगीतों और किस्सों में जिंदा हैं। लोहड़ी पर उनकी कहानी सुनाने की परंपरा है। बुजुर्ग युवा पीढ़ी को यह कहानी सुनाते हैं। इससे सामाजिक मूल्यों की शिक्षा भी मिलती है।
उनका चरित्र न्याय और साहस का प्रतीक माना जाता है। गलत के खिलाफ आवाज उठाने की प्रेरणा उनसे मिलती है। लोहड़ी का पर्व सिर्फ फसल की खुशी का नहीं है। यह सामाजिक न्याय और स्त्री सम्मान का संदेश भी देता है। दुल्ला भट्टी की विरासत को यह पर्व जीवित रखता है।
ऐतिहासिक साक्ष्य और लोककथाएं
दुल्लाभट्टी के बारे में कई लोककथाएं प्रचलित हैं। इतिहासकारों ने भी उनके बारे में लिखा है। मुगल दरबार के अभिलेखों में उनका उल्लेख मिलता है। उन्हें एक शक्तिशाली विद्रोही नेता बताया गया है। उन्होंने मुगल सेना को कई बार चुनौती दी थी।
अंततः मुगलों ने उन्हें पकड़कर सजा-ए-मौत दी। लेकिन लोगों के दिलों में वह हमेशा जिंदा रहे। उनकी कहानी ने लोकसंस्कृति में एक अमिट छाप छोड़ी। लोहड़ी का गीत इसका जीता-जागता सबूत है। हर साल यह गीत दुल्ला भट्टी को श्रद्धांजलि देता है।
