Culture News: महाभारत में एक विचारोत्तेजक प्रसंग राजा धृतराष्ट्र और महात्मा विदुर के बीच हुई बातचीत का है। धृतराष्ट्र ने विदुर से पूछा कि शास्त्रों में मनुष्य की आयु सौ वर्ष बताई गई है। फिर भी अधिकांश लोग पूरी आयु क्यों नहीं जी पाते। इस पर विदुर ने आयु क्षीण करने वाले छह गंभीर दोषों का उल्लेख किया।
अभिमान: स्वयं को श्रेष्ठ समझना
विदुर के अनुसार अभिमान यानी घमंड मनुष्य को अंधा बना देता है। ऊंचा पद, प्रशंसा या शक्ति मिलने पर व्यक्ति दूसरों को तुच्छ समझने लगता है। ऐसा व्यक्ति अनजाने में ही शत्रु बना लेता है। अंततः उसका अहंकार ही उसके पतन का कारण बनता है।
यह दोष मनुष्य के निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करता है। वह गलतियों से सीखना बंद कर देता है। आत्ममुग्धता उसकी बुद्धि पर परदा डाल देती है। इससे उसके संबंध और स्वास्थ्य दोनों प्रभावित होते हैं।
अधिक बोलना: वाणी पर असंयम
जो व्यक्ति आवश्यकता से अधिक बोलता है वह सत्य और मर्यादा दोनों से भटक जाता है। असंयमित वाणी से विवाद, अपमान और वैमनस्य पैदा होता है। ऐसे लोग न तो विद्वानों को प्रिय होते हैं न ही समाज में सम्मान पाते हैं।
अनावश्यक बोलना मानसिक शांति को भंग करता है। यह ऊर्जा का अपव्यय है और तनाव का कारण बनता है। संयमित भाषण व्यक्तित्व में गरिमा लाता है। विदुर ने इस दोष को आयु का शत्रु बताया है।
क्रोध: सबसे बड़ा शत्रु
शास्त्रों में क्रोध को नरक का द्वार कहा गया है। क्रोधित व्यक्ति सही-गलत का विवेक खो देता है। वह ऐसे कर्म कर बैठता है जिनका परिणाम विनाशकारी होता है। जिसने क्रोध पर विजय पा ली वही सच्चा सुखी और योगी कहलाता है।
क्रोध शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। यह रक्तचाप बढ़ाता है और हृदय रोगों का कारण बनता है। क्रोध पर नियंत्रण जीवन की गुणवत्ता सुधारता है। यह दीर्घायु प्राप्ति के लिए आवश्यक है।
त्याग का अभाव: संग्रह की प्रवृत्ति
रावण और दुर्योधन जैसे पात्रों का पतन त्याग की कमी के कारण हुआ। सांसारिक भोग मनुष्य की आयु को क्षीण करते हैं। जबकि त्याग जीवन को विस्तार देता है। जो केवल लेना जानता है उसका जीवन शीघ्र सिमट जाता है।
संग्रह की प्रवृत्ति मनुष्य को लोभी बना देती है। यह असंतोष और तनाव पैदा करती है। त्याग से मन को शांति मिलती है। साथ ही सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
स्वार्थ: अधर्म की जड़
स्वार्थ और लालच अधिकांश संघर्षों और युद्धों की जड़ हैं। स्वार्थी व्यक्ति अपने लाभ के लिए किसी भी सीमा तक जा सकता है। ऐसा मनुष्य भीतर से अशांत रहता है। उसकी आयु भी घटती जाती है।
स्वार्थपरता मानवीय संबंधों को कमजोर करती है। यह सामाजिक विश्वास को नष्ट करती है। परोपकार और दया भाव जीवन को समृद्ध बनाते हैं। निस्वार्थ कर्म आयु बढ़ाने में सहायक होते हैं।
मित्रद्रोह: विश्वास का विनाश
मित्रों का साथ जीवन की सबसे बड़ी शक्ति होता है। जो अपने मित्रों से विश्वासघात करता है उसका जीवन भय और अकेलेपन से भर जाता है। मित्रद्रोही व्यक्ति के लिए जीवन स्वयं नरक बन जाता है।
विश्वासघात मानसिक तनाव का बड़ा कारण है। इससे समाज में सम्मान खो जाता है। सच्ची मित्रता जीवन को सुखद और दीर्घ बनाती है। विश्वसनीयता दीर्घायु का एक रहस्य है।
सभी दोष आपस में जुड़े हैं
विदुर के बताए ये छह दोष एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। अभिमान से क्रोध पैदा होता है। क्रोध से स्वार्थ जन्म लेता है। स्वार्थ से मित्रद्रोह की स्थिति बनती है। इन सभी दोषों का समग्र प्रभाव जीवन को छोटा कर देता है।
इन दोषों से बचाव के लिए आत्मनिरीक्षण आवश्यक है। नियमित साधना और संयम से इन पर विजय पाई जा सकती है। विदुर की यह शिक्षा आज के युग में भी प्रासंगिक है। इन दोषों से मुक्ति दीर्घ और सार्थक जीवन की कुंजी है।
